विजयादशमी महापर्व है साहस और संकल्प का, इस पर्व से जुड़ी लोकप्रिय कथा

स्वप्निल व्यास @ इंदौर. विजयादशमी के दिन रावण, मेघनाद व कुंभकर्ण के बड़े-बड़े पुतले बनाकर उनका दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का सूत्रवाक्य दोहराते हैं। किन्तु समाज की स्थितियां देख नहीं लगता कि बुराई हारी है और अच्छाई जीती है। अत्याचार, अनाचार, दुराचार व भ्रष्टाचार का रावण हमारे चहुंओर तांडव कर रहा है। यह हमारे वर्तमान सामाजिक जीवन की विडम्बनाग्रस्त सच्चाई है। आज हम अपने ऋषि-मनीषियों द्वारा बतायी गयी पर्वों की प्रेरणाओं को पूरी तरह भुला बैठे हैं। पर्वों में निहित आत्मिक संवेदना हमारी जड़ता के कुटिल व्यूह में फंसकर मुरझा गयी है।
समझना होगा कि विजयादशमी इसी साहस और संकल्प का महापर्व है। जीवन की शक्तियों को जाग्रत करने और उन्हें सही दिशा में नियोजित करने की महान प्रेरणाएं इसमें समायी हैं। विजयादशमी के साथ जितनी भी पुराकथाएं व लोक परम्पराएं जुड़ी हुई हैं, सबका सार यही है। इस पर्व से जुड़ा सबसे लोकप्रिय संदर्भ मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के जीवन का है।
लेखक स्वप्निल व्यास, इंदौर
राम कथा विभिन्न भाषाओं के विभिन्न महाकाव्यों में अनेक तरह से कही गयी है। कुछ पौराणिक कथानकों के मुताबिक लोकनायक श्री राम ने महर्षियों के आश्रम में ‘निसिचर हीन करौं महि’ का वज्र संकल्प आश्विन शुक्ल दशमी को ही लिया था और कुछ वर्षों बाद विभिन्न घटनाक्रमों के उपरांत वह यही तिथि विजयादशमी बन गयी जब श्रीराम का वह संकल्प पूर्ण हुआ। यही नहीं, भगवती महिषमर्दिनी ने भी इसी पुण्यतिथि को महिषासुर के आसुरी दर्प का दलन कर देवशक्तियों का त्राण किया था। विजयादशमी माता आदिशक्ति की उसी विजय की यशोगाथा है।
हो सकता है कि जिन्हें केवल पुराग्रन्थों के ऐतिहासिक आंकड़ों के आंकलन में रुचि हो उन्हें लोक काव्यों के ये प्रसंग महज गल्प प्रतीत हों लेकिन जिन भावनाशीलों को जीवन के भाव-सत्य से प्रेम है, वे इन प्रसंगों से प्रेरणा लेकर अपनी भक्ति एवं शक्ति की अभिवृद्धि की बात जरूर सोचते हैं। विजयादशमी शक्ति के उपासक क्षत्रिय समाज का प्रतिनिधि पर्व है। प्राचीनकाल में इस पर्व को बड़ी ही धूमधाम से मनाने का प्रचलन था। देश का मध्ययुगीन इतिहास भी इसके छुट-पुट प्रमाण देता है।
विडम्बना है कि हमारा साहस और संकल्प आज दिशा से भटक चुका है। हम साहसी तो हैं, पर नवनिर्माण के लिए नहीं, बल्कि तोड़-फोड़ के लिए, हम अपने संकल्पों की शक्ति निज की अहंता के उन्माद को फैलाने और साम्प्रदायिक दुर्भाव को बढ़ाने में लगाते हैं, देश की समरसता एवं सौहार्द में विष घोलने का काम करते हैं; जबकि होना यह चाहिए कि हमारे साहस और संकल्प की ऊर्जा आतंकवादी बर्बरता के गढ़ को विध्वंस करने में नियोजित हो और हमारा वज्र संकल्प उन्हें खण्ड-खण्ड करने में अपनी प्रतिबद्धता दिखाए जो हमारे गौरवशाली देश की अखण्डता को नष्ट करने में तुले हैं। आइए मिलकर भूल सुधारें और इस विजयादशमी हम सब मिलकर एक साहस भरा संकल्प लें अपनी निज की और समाज की दुष्प्रवृत्तियों को मिटाने का, अनीति और कुरीति के विरुद्ध संघर्ष करने का

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