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कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी, इस दिन माता को चढ़ाया जाता है बासी भोजन, जानें पौराणिक कथा

हर वर्ष होली के आठवें दिन यानि चैत्र मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी मनाई जाती है। इस बार यह व्रत 4 अप्रैल 2021 को पड़ रहा है। शीतला अष्टमी को बसोड़ा भी कहा जाता है। इस बार शीतलाष्टमी को लेकर सभी के मन में सवाल है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान के निदेशक ज्योतिषाचार्य अनीष व्यास ने बताया कि जहां तक शास्त्रों की बात की जाए तो यह स्पष्ट है कि शनिवार और रविवार को आकरा वार (उग्र वार) माना जाता है और माता की पूजा शनिवार रविवार को नहीं की जाती है। गुरुवार 1 अप्रैल को बासौड़ा यानि रांधा पुआ बनाया जाएगा और 2 अप्रैल को शीतला माता के भोग लगाया जाएगा। नाम के अनुसार ही शीतला माता को शीतल चीजें पसंद हैं। मां शीतला का उल्लेख सर्वप्रथम स्कन्दपुराण में मिलता है। इनका स्वरूप अत्यंत शीतल है और कष्ट-रोग हरने वाली हैं। गधा इनकी सवारी है और हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते हैं। मुख्य रूप से इनकी उपासना गर्मी के मौसम में की जाती है।

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शीतला सप्तमी को बनाए जाने वाला रांधा पुआ यानि बासौड़ा गुरुवार को ही बनाया जाएगा और शुक्रवार को भोग लगाया जाएगा। इसका विस्तृत उल्लेख पुराणों में मिलता है। ज्योतिषाचार्य अनीष व्यास ने बताया कि राजस्थान में खासकर महिलाएं शनिवार और रविवार को आकरा वार (उग्र वार) होने के कारण शीतला माता की पूजा नहीं करती है इसी कारण गुरुवार 1 अप्रैल को बासौड़ा यानि रांधा पुआ बनाया जाएगा और 2 अप्रैल को शीतला माता के भोग लगाया जाएगा। नाम के अनुसार ही शीतला माता को शीतल चीजें पसंद हैं। इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से व्यक्ति को चेचक, खसरा जैसे रोगों का प्रकोप नहीं रहता। मान्यता के अनुसार शीतला माता को ठंडी चीजें बहुत प्रिय होती है। शीतला सप्तमी और अष्टमी को ठंडी चीजों का भोग लगाया जाता है। जिस जगह होली की पूजा होती है, उसी जगह बसौड़े की पूजा की जाती है।

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अनीष व्यास, विश्वविख्यात भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक, पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान, जयपुर 9460872809

विख्यात भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि स्कन्द पुराण में माता शीतला की अर्चना का स्तोत्र ‘शीतलाष्टक’ के रूप में प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि- इस स्तोत्र की रचना स्वयं भगवान शंकर ने की थी। शास्त्रों में भगवती शीतला की वंदना के लिए यह मंत्र बताया गया है। मंत्र है-

वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।।
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।

विश्वविख्यात भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि जो लोग अष्टमी की पूजा करते हैं वो लोग सप्तमी की रात को खाना बनाकर अष्टमी को बासी खाने को प्रसाद के रूप में शीतला माता को अर्पित करते हैं। अष्टमी तिथि से एक दिन पहले यानी सप्तमी तिथि को ही शीतला अष्टमी के लिए प्रसाद का भोजन बनाया जाता है उसे बसौड़ा कहा जाता है। इस दिन लोग भी बासी भोजन ही खाते हैं। शीतला अष्टमी पर माता शीतला को मुख्य रूप से दही, राबड़ी, चावल, हलवा, पूरी, गुलगुले का भोग लगाया जाता है। इसी को स्वयं भी ग्रहण किया जाता है। कुछ स्थानों पर इनकी पूजा होली के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार अथवा गुरुवार के दिन ही की जाती है।

विश्वविख्यात भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि अगर आप अपने घर की सुख-समृद्धि बनाये रखना चाहते हैं तो आपको स्नान आदि के बाद शीतला माता के इस मंत्र का 51 बार जप करना चाहिए। मंत्र इस प्रकार है- ऊँ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः। आज के दिन ऐसा करने से आपके घर की सुख-समृद्धि बनी रहेगी। साथ ही आपके परिवार के सदस्यों की सेहत भी अच्छी रहेगी।

विख्यात भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि अगर आप भय और रोग आदि से छुटकारा पाना चाहते हैं तो आपको देवी शीतला के इस मंत्र का 21 बार जप करना चाहिए। मंत्र है-

वन्देSहं शीतलां देवीं सर्वरोग भयापहम्।
यामासाद्य निवर्तेत विस्फोटक भयं महत्।।

विख्यात भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि अगर आप अच्छे स्वास्थ्य की कामना रखते हैं। साथ ही लंबी आयु का वरदान पाना चाहते हैं, तो आपको शीतलाष्टक स्त्रोत में दी गई इन पंक्तियों का जाप करना चाहिए। पंक्तियां इस प्रकार हैं-

मृणाल तन्तु सदृशीं नाभि हृन्मध्य संस्थिताम्।
यस्त्वां संचिन्त येद्देवि तस्य मृत्युर्न जायते।।

विख्यात भविष्यवक्ता अनीष व्यास ने बताया कि ऐसी प्राचीन मान्यता है कि जिस घर की महिलाएं शुद्ध मन से इस व्रत को करती है, उस परिवार को शीतला देवी धन-धान्य से पूर्ण कर प्राकृतिक विपदाओं से दूर रखती हैं। मां शीतला का पर्व किसी न किसी रूप में देश के हर कोने में मनाया जाता है। विशेष कर चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को शीतला सप्तमी-अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को बसोरा (बसौड़ा) भी कहते हैं। बसोरा का अर्थ है बासी भोजन। शीतला माता हर तरह के तापों का नाश करती हैं और अपने भक्तों के तन-मन को शीतल करती हैं। इस दिन घर में ताजा भोजन नहीं बनाया जाता। एक दिन पहले ही भोजन बनाकर रख देते हैं। फिर दूसरे दिन प्रात:काल महिलाओं द्वारा शीतला माता का पूजन करने के बाद घर के सब व्यक्ति बासी भोजन को खाते हैं। जिस घर में चेचक से कोई बीमार हो उसे यह व्रत नहीं करना चाहिए। कहते हैं कि नवरात्रि के शुरू होने से पहले यह व्रत करने से मां के वरदहस्त अपने भक्तों पर रहते हैं।

शीतला अष्टमी का महत्व

विख्यात कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि मान्यता है कि शीतला अष्टमी से ही ग्रीष्मकाल की शुरुआत हो जाती है। इस दिन से ही मौसम तेजी से गर्म होने लगता है। शीतला माता के स्वरूप को शीतलता प्रदान करने वाला कहा गया है। सिर्फ यही नहीं, कहा जाता है कि माता शीतला का व्रत करने से चेचक, खसरा व नेत्र विकार जैसी समस्याएं ठीक हो जाती हैं। यह व्रत रोगों से मुक्ति दिलाकर आरोग्यता प्रदान करता है।

व्रत विधि

विश्वविख्यात भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि माता के प्रसाद के लिए एवं परिवार जनों के भोजन के लिए एक दिन पहले ही भोजन पकाया जाता है। माता को सफाई पसंद है, इसलिए सब कुछ साफ-सुथरा होना आवश्‍यक है। इस दिन प्रात: काल उठना चाहिए। स्नान करें। व्रत का संकल्प लेकर विधि-विधान से मां शीतला की पूजा करें। पहले दिन बने हुए यानि बासी भोजन का भोग लगाएं।. साथ ही शीतला सप्तमी-अष्टमी व्रत की कथा सुनें।

शीतला सप्तमी व्रत कथा

विश्वविख्यात भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि एक बार शीतला सप्तमी के दिन एक बुढ़िया व उसकी दो बहुओं ने व्रत रखा। उस दिन सभी को बासी भोजन ग्रहण करना था।इसलिये पहले दिन ही भोजन पका लिया गया था। लेकिन दोनों बहुओं को कुछ समय पहले ही संतान की प्राप्ति हुई थी कहीं बासी भोजन खाने से वे व उनकी संतान बिमार न हो जायें इसलिये बासी भोजन ग्रहण न कर अपनी सास के साथ माता की पूजा अर्चना के पश्चात पशओं के लिये बनाये गये भोजन के साथ अपने लिये भी रोट सेंक कर उनका चूरमा बनाकर खा लिया। जब सास ने बासी भोजन ग्रहण करने की कही तो काम का बहाना बनाकर टाल गई। उनके इस कृत्य से माता कुपित हो गई और उन दोनों के नवजात शिशु मृत मिले। जब सास को पूरी कहानी पता चली तो उसने दोनों को घर से निकाल दिया। दोनों अपने शिशु के शवों को लिये जा रही थी कि एक बरगद के पास रूक विश्राम के लिये ठहर गई। वहीं पर ओरी व शीतला नामक दो बहनें भी थी जो अपने सर में पड़ी जूंओं से बहुत परेशान थी. दोनों बहुओं को उन पर दया आयी और उनकी मदद की सर से जूंए कम हुई तो उन्हें कुछ चैन मिला और बहुओं को आशीष दिया कि तुम्हारी गोद हरी हो जाये उन्होंने कहा कि हरी भरी गोद ही लुट गई है इस पर शीतला ने लताड़ लगाते हुए कहा कि पाप कर्म का दंड तो भुगतना ही पड़ेगा। बहुओं ने पहचान लिया कि साक्षात माता हैं तो चरणों में पड़ गई और क्षमा याचना की, माता को भी उनके पश्चाताप करने पर दया आयी और उनके मृत बालक जीवित हो गये। तब दोनों खुशी-खुशी गांव लौट आयी। इस चमत्कार को देखकर सब हैरान रह गये। इसके बाद पूरा गांव माता को मानने लगा।

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