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Papmochani Ekadashi 2021: पापमोचनी एकादशी व्रत आज, मात्र इस एक व्रत को करने से मिलती है सभी पापों से मुक्ति

एकदशी का व्रत भगवान विष्णु के लिए किया जाता है. हर महीने में दो एकादशी आती हैं एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में. शुक्ल और कृष्ण पक्ष की ग्यारहवी तिथि को एकादशी (papmochani ekadashi 2021) कहा जाता है. इस तरह साल में कुल 24 एकादशी आती हैं. पुराणों में एकादशी व्रत की महिमा का वर्णन मिलता है कहते हैं जो भी एकादशी का व्रत करता है भगवान विष्णु की कृपा उस व्यक्ति पर बनी रहती है. आज हम आपको पापमोचिनी एकादशी के बारे में बताएंगे.

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चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को पापमोचिनी एकादशी के (papmochani ekadashi 2021) नाम से जाना जाता है. कहते हैं जो व्यक्ति पापमोचिनी एकादशी का व्रत करता है उसे समस्त पापों से छुटकारा मिल जाता है. इस साल 7 अप्रैल को पाप मोचिनी एकादशी मनाई जाएगी.

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शास्त्रों में पापमोचिनी एकादशी के बारे में लिखा गया है कि इस व्रत के करने से व्यक्ति को अशुभ ग्रह के प्रभाव से मुक्ति मिलती है. व्रत करने से व्यक्ति के मन के बुरे विचार भी खत्म हो जाते हैं. जिन लोगों को चंद्रमा से शुभ फल प्राप्त न हो रहा हो यदि वो लोग पापमोचिनी एकादशी का व्रत करें तो उन्हें चंद्रमा से शुभफल की प्राप्ति होती है.

भगवान विष्णु को पीला रंग अति प्रिय है इसलिए पापमोचिनी एकदाशी (papmochani ekadashi 2021) के दिन भगवान विष्णु का पीले रंग के फूलों से श्रृंगार करना चाहिए. इस दिन भगवान विष्णु के साथ ही नवग्रहों की पूजा भी करनी चाहिए. जो लोग इस दिन व्रत करने में समर्थ न हों वो एक समय भोजन कर के भी व्रत कर सकते हैं. पापमोचनी एकादशी के दिन व्रत और भगवान विष्णु की आराधना करने से व्यक्ति को समस्त सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है.

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पूजा विधि papmochani ekadashi 2021

एकादशी के दिन भगवान विष्णु के चतुर्भुज स्वरूप की पूजा करनी चाहिए, सुबह स्नान कर किसी लकड़ी के पाटे पर पीले रंग का कपड़ा बिछा उस पर भगवान की प्रतिमा को स्थापित करना चाहिए. सीधे हाथ में चंदन और फूल लेकर एकादशी व्रत का संकल्प लें. भगवान को इस दिन पीले वस्त्र, पीले फूल और पीले रंग का भोग अर्पित करें. जनेऊ समर्पित करें. भगवान विष्णु के सहस्त्र नामों का जप करें.

पापमोचनी एकादशी की महिमा papmochani ekadashi 2021

पापमोचिनी एकादशी के बारे में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को बताया था, कहते हैं राजा मांधाता ने लोमश ऋषि से अनजाने में किए हुए पापों से मुक्ति का उपाय पूछा था तब लोमश ऋषि ने राजा मांधाता को एक कथा सुनाई थी. कहते हैं एक बार चैत्ररथ नामक सुन्दर वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि तपस्या कर रहे थे. तभी वहां मंजुघोषा नाम की एक अप्सरा आई और वो ऋषि पर मोहित हो गई तथा उन्हें आकर्षित करने के लिए कोशिशें करने लगी. वहां से गुजरते हुए कामदेव की नजर उस अप्सरा पर पड़ी और वो अप्सरा की मदद करने के लिए वहां पहुंच गए. कामदेव की सहायता से वो अप्सरा ऋषि को मोहित करने में सफल हो गई और ऋषि कामपीड़ित हो गए. तपस्या छोड़ ऋषि अप्सरा के साथ रमण करने लगे, कई सालों बाद ऋषि को अपनी भूल का एहसास हुआ. उन्हें अप्सरा पर क्रोध आया और खुद पर ग्लानि हुई, गुस्से में उन्होंने उस अप्सरा का पिशाचिनी होने का श्राप दे दिया. श्राप से पीड़ित अप्सरा दुखी होकर श्राप मुक्ति के लिए प्रार्थना करने लगी. तभी देवर्षि नारद ने अप्सरा और ऋषि दोनों को पापमोचिनी एकादशी के बारे में बताया. और पापों से मुक्ति के लिए इस व्रत को करने की सलाह दी. नारद जी द्वारा बताए तरीके से ऋषि और अप्सरा दोनों ने पापमोचनी एकादशी का व्रत किया, व्रत के प्रभाव से ऋषि अपने पाप से मुक्त हो गए वहीं अप्सरा को भी ऋषि के श्राप से मुक्ति मिली और वो पिशाच योनि से मुक्त हो अपने सुंदर रूप के साथ स्वर्ग को गई.

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