जय वीर हनुमान : मंगलवार का पंचांग, दिनांक 16 अक्टूबर 2018 का सूर्यसिद्धान्तीय सूर्य पंचांग

जय श्रीराधेकृष्ण!
-सूर्यसिद्धान्तीय
-(सूर्य पंचांग रायपुर)
-दिनांक 16 अक्टूबर 2018
-मंगलवार
-सूर्योदय 05:44:03
-सूर्यास्त 05:19:15
-दक्षिणायन
-संवत् 2075
-शक् 1940
-ऋतु- शरद
-आश्विन मास
-शुक्ल पक्ष
-सप्तमी तिथि 10:00:33 परं अष्टमी तिथि
-पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र 19:04:33
परं उत्तराषाढ़ा नक्षत्र
-अतिगंड योग 09:43:06 परं सुकर्मा योग
-प्रथम वणिज करण 10:41
-द्वितिय विष्टी करण 43:00
-राहुकाल-15:31 / 17:01 अशुभ
-अभिजीत 11:42/ 12 :28 शुभ
-सूर्य- कन्या राशि
-चन्द्र- धनु राशि 25:41:05 परं मकर राशि
-भद्रकाली दुर्गा जयंती
-कालरात्रिदेवीदर्शनं
-रात्रि महानाशापूजाबलिदानादिकश्च
-अन्नपूर्णा परिक्रमा 10:00उ
-भद्रारंभः 10:00
-भद्रान्तः 22:56
-पत्रिकाप्वेशनं
-सप्तम्यां प्रातरानीय गृहमध्ये प्रपूजयेत
-दग्धतिथि 10:00 उ
-पूर्वाषाढ़ा में- भद्रापूर्व यंत्रशस्त्रघटन मुहूर्त

डाॅ गीता शर्मा, ज्योतिष मनीषी, कांकेर छत्तीसगढ।
(7974032722)

-आश्विनीमासः
-नवरात्रि पर्व
-कालरात्रिदेवीदर्शनम्
-महानिशापूजनं ( रात्रि)
-विश्व खाद्य दिवस

*नवरात्रि महापर्व*➖
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या देवि! सर्वभूतेषु!
-नवरात्रि महापर्व, शक्ति आराधना, उपासना, साधना, का पर्व है ।इन्द्रियों के संयमन एवं आसुरी प्रवत्तियों पर नियंत्रण का यह पर्व है।
दुर्गादेवी की दिव्य शक्तियां समस्त विश्व में , समस्त सृष्टि में, समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं।देवी शक्ति के जितने भी अवतार हुये उन सभी देवियों ने किसी न किसी असुर का संहार कर जगत की रक्षा की है।

“सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्व शक्ति समन्विते।
भयेभ्यस्त्रहि नो देवी दुर्गे देवी नमोऽस्तुते।।”
अपने इष्ट-मंत्र का जप रात्रि महानिशापूजन में करिये।मंत्र सिद्ध हो जाता है।

श्रीमद् भगवद् गीता

विश्व में गीता का समादर है।भारत में प्रकट हुई गीता विश्व मनीषा की धरोहर है।
अतः इसे राष्ट्रीय शास्त्र का मान देकर कलह-कष्ट से पीड़ित विश्व की जनता को शान्ति देने का प्रयास आवश्यक है।

“अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि।।”
(प्र अ 7)
अर्थात् द्विजोत्तम!
हमारे पक्ष में जो जो प्रधान हैं, उन्हें भी आप समझ लें।आपको जानने के लिये मेरी सेनाके जो नायक हैं, उनको कहता हूं—– ,
क्रमशः-

गीता में अन्तःकरण की दो प्रवत्तियों का संघर्ष है।जिसमें द्वैत का आचरण ही द्रोण है।जब तक प्रकृति विद्यमान है , द्वैत बना है।इस “द्वि” पर जय पाने की प्रेरणा प्रथम गुरू द्रोणाचार्य से मिलती है ।अधूरी शिक्षा ही पूर्ण जानकारी के लिये प्रेरणा प्रदान करती है ।

निज चिन्तन

हमें “जलाने” वाले कुछ “दिये” वही होते हैं——,

जिन्हें हमने कभी “आंधियों” में
“बुझने” से बचाया था—–!

(चलते रहिये)

श्रीकृष्णं शरणं ममः

डाॅ गीता शर्मा
माँ गायत्री ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र, कांकेर, छत्तीसगढ

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