Home धर्म कथाएं कामदा एकादशी पर पूरी होंगी कामनाएं, पढ़े पौराणिक कथा

कामदा एकादशी पर पूरी होंगी कामनाएं, पढ़े पौराणिक कथा

एकादशी का व्रत हिंदु धर्म में बेहद खास महत्व रखता है साल भर में 24 एकादशी आती हैं. अधिकमास होने पर दो एकादशी बढ़ जाती हैं, और अधिकमास वाले साल में कुछ 26 एकादशियां आती हैं. चैत्र के महीने में पापमोचिनी और कामदा एकादशी (kamada ekadashi) आती है. पापमोचिनी एकादशी से व्यक्ति को उसके पापों से मुक्ति मिलती है वहीं कामदा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति की कामनाएं पूर्ण होती हैं. इस बार कामदा एकादशी 23 अप्रैल को है.कामदा एकादशी (kamada ekadashi ) का व्रत करने से व्यक्ति को राक्षस योनि से छुटकारा मिलता है. इसके साथ ही जो व्यक्ति कामदा एकादशी का व्रत करता है उसके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं. उसकी जो भी मनोकामना हो वो पूर्ण हो जाती है.

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एकादशी व्रत के करने से व्यक्ति को 26 तरह के फायदे होते हैं, इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को निरोगी काया मिलती है उसे राक्षस, भूत-पिशाचों की योनी से छुटकारा मिलता है. पापों और संकटों से व्यक्ति मुक्त हो जाता है. व्रत करने से व्यक्ति के सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं उसे सौभाग्य की प्राप्ति होती है, धन और समृद्धि बनी रहती है, मोह-माया के बंधनों से व्यक्ति मुक्त हो जाता है. जीवन में शांति बनी रहती है. व्यक्ति की जो भी इच्छा होती है भगवान विष्णु की कृपा से वो पूरी हो जाती है. घर परिवार में खुशियां बनी रहती हैं, व्यक्ति को पितृदोषों से मुक्ति मिलती है, धन-ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, दरिद्रता दूर होती है, शत्रुओं का नाश होता है, रोग शोक दूर हो जाते हैं, व्यक्ति की कीर्ति दूर-दूर तक फैलती है, जो व्यक्ति एकादशी का व्रत करता है उसे अश्वमेघ यज्ञ के बराबर फल मिलता है.

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कामदा एकादशी व्रत की पौराणिक कथा kamada ekadashi

एकादशी व्रत में एकादशी की कथा का बहुत महत्व होता है आइए आपको कामदा एकादशी के व्रत की पौराणिक कथा बताते हैं. कामदा एकादशी की कथा भोगीपुर नाम के एक नगर से शुरू होती है. कहते हैं भोगीपुर में पुण्डरीक नामक एक राजा का राज्य हुआ करता था. भोगीपुर में अप्सरा, किन्नर तथा कई गंधर्व निवास किया करते थे, एक गंधर्व का नाम ललित था, ललित और ललिता नाम के गंधर्व में आपस में बहुत प्रेम था. गंधर्व ललित एक दिन राजा के दरबार में गाना गा रहा था गाना गाते समय उसे अपनी पत्नी ललिता की याद आ गई जिसके कारण उसका स्वर, लय और ताल भरे दरबार में बिगड़ गया. कर्कट नाम के एक नाग ने इस बात को जान लिया और यह बात राजा को बता दी. कहते हैं राजा ने क्रोधित होकर उस गंधर्व को राक्षस बनने का श्राप दे दिया.राजा के श्राप से गंधर्व ललित कई सालों तक राक्षस की योनी में यहां वहां भटकता रहा, उसकी पत्नी ललिता भी उसके पीछे-पीछे भटकती रही और अपने पति की हालत पर दुखी होती रही. कई सालों तक यहां वहां घूमने के बाद एक बार गंधर्व की पत्नी विंध्य पर्वत पर रहने वाले ऋष्यमूक ऋषि के पास गई और अपने श्रापित पति के बारे में बताकर उनसे अपने पति के उद्धार का कारण पूछा,

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जब ऋषि ने ललिता की बात सुनी तो उन्हें उस पर दया आ गई, और उन्होंने ललिता को चैत्र शुक्ल पक्ष में आने वाली कामदा एकादशी के व्रत करने के लिए कहा. ऋषि का आशीष लेकर ललिता वापस आ गई, कामदा एकादशी का व्रत आने पर उसने पूरी श्रद्धा से कामदा एकादशी का व्रत किया, कामदा एकादशी के व्रत के प्रभाव से उसके पति ललित को राक्षस योनी से मुक्ति मिली और वो पुन: अपनी गंधर्व की योनी में वापस आ गया. जो व्यक्ति पूरी श्रद्धा के साथ कामदा एकादशी का व्रत करता है उसके समस्य पापों का नाश हो जाता है और भगवान विष्णु की कृपा से उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं.

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