Home धर्म कथाएं पढ़िए मां ब्रह्मचारिणी की पौराणिक कथा, आरती और मंत्र 

पढ़िए मां ब्रह्मचारिणी की पौराणिक कथा, आरती और मंत्र 

नवरात्र के दूसरे दिन मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा की जाती है. माता का ये रूप तप का आचरण करने वाली देवी का प्रतीक है, मां ब्रह्मचारिणी के दाएं हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल धारण करती हैं. कहते हैं मां ब्रह्माचिरी ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी इसलिए उन्हें ब्रह्मचारिणी के नाम से जाना गया, मां ब्रह्मचारिणी पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं, कहते हैं जो भी भक्त माता के इस रूप की आराधना करता है देवी उसे उज्जवलता और ऐश्वर्य प्रदान करती हैं. आज हम आपको देवी ब्रह्मचारिणी की पूजन विधि पौराणिक कथा व भोग के बारे में बताएंगे.

कैसे करें मां ब्रह्मचारिणी का पूजन how to worship maa brahmacharini

मां ब्रह्मचारिणी का पूजन करने के लिए सुबह अपने नित्यकर्मों से निवृत्त होकर स्नान करें व वस्त्र धारण करें. आसन पर बैठ जाएं और मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करें. माता को फूल,अक्षत, रोली, चंदन अर्पित करें.

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माता के स्नान के लिए दूध,दही,घृत,मधु व शर्करा से का प्रयोग करें. मां ब्रह्मचारिणी को पिस्ते की मिठाई अति प्रिय है इसलिए भोग में पिस्ते की मिठाई अर्पित करें.

भोग के साथ ही माता को लौंग, सुपारी और पान भी चढ़ाएं. मंत्रों के जाप के साथ हवन करें, हवन में हवन सामग्री के साथ ही बताशा, लौंग का जोड़ा, पान, सुपारी, कपूर, गुगल, इलायची, किसमिस, कमलगट्टा चढ़ाएं. माता ब्रह्मचारिणी के मंत्र ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रूं ब्रह्मचारिण्‍यै नम: का जप करें.

मां ब्रह्मचारिणी का भोग maa brahmacharini bhog in hindi

माता ब्रह्मचारिणी को पिस्ते की मिठाई पसंद है इसलिए माता को पिस्ते से बने मीठे पदार्थों का भोग लगाएं.

पूजा में माता को गुड़हल और कमल का फूल अर्पित करें.

माता को चीनी, मिश्री और पंचामृत भी बेहद प्रिय है भोग में आप इसका प्रयोग भी कर सकते हैं.

माता को प्रिय पदार्थों का भोग लगाने से वो जल्दी प्रसन्न होती हैं.

मां ब्रह्मचारिणी की कथा maa brahmacharini katha in hindi

माता ब्रह्मचारिणी पर्वतराज हिमालय की कन्या हैं, माता सती ने पर्वतराज हिमालय के घर कन्या के रूप में पुनर्जन्म लिया था. नारद जी के कहने पर देवी ने शिवजी को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की, इस कठिन तपस्या के कारण माता का नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा. माता को तपश्चारिणी के नाम से भी जाना जाता है, कहते हैं तपस्या के दौरान माता ने अन्न का त्याग कर केवल बेलपत्र का सेवन किया था, तमाम दुखों के बीच भी वो भगवान शंकर की कठिन आराधना करती रहीं. कई सालों की कठिन तपस्या के बाद उन्होंने बेलपत्र खाने भी बंद कर दिए व निर्जल व निराहार रहकर शिवजी की तपस्या करती रहीं. जब देवी ने भोजन के रूप में बेलपत्रों को खाना बंद किया था तो उनका नाम अपर्णा भी पड़ा, कठिन तप के कारण माता का शरीर क्षीर्ण हो गया और देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने माता ब्रह्मचारिणी की तपस्या की सराहना की. और माता की तपस्या के सफल होने का आशीष दिया. जो भक्त माता ब्रह्मचारिणी की आराधना करते हैं देवी की कृपा से उनके सभी काम सिद्ध होते हैं, उनका मन कभी विचलित नहीं होता. व माता की कृपा बनी रहती है.

मां ब्रह्मचारिणी की आरती brahmacharini aarti in hindi

जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।

जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।

ब्रह्मा जी के मन भाती हो।

ज्ञान सभी को सिखलाती हो।

ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।

जिसको जपे सकल संसारा।

जय गायत्री वेद की माता।

जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।

कमी कोई रहने न पाए।

कोई भी दुख सहने न पाए।

उसकी विरति रहे ठिकाने।

जो तेरी महिमा को जाने।

रुद्राक्ष की माला ले कर।

जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।

आलस छोड़ करे गुणगाना।

मां तुम उसको सुख पहुंचाना।

ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।

पूर्ण करो सब मेरे काम।

भक्त तेरे चरणों का पुजारी।

रखना लाज मेरी महतारी।

मां ब्रह्मचारिणी के मंत्र: brahmacharini mantra

  1. या देवी सर्वभेतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

दधाना कर मद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।

देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

  1. ब्रह्मचारयितुम शीलम यस्या सा ब्रह्मचारिणी.

सच्चीदानन्द सुशीला च विश्वरूपा नमोस्तुते..

  1. ओम देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥
  2. मां ब्रह्मचारिणी का स्रोत पाठ:

तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।

ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।

शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥

  1. मां ब्रह्मचारिणी का कवच

त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।

अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥

पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥

षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।

अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

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