पितृ पक्ष: जानिए क्या है पितृ तर्पण का महत्व, घर में कैसे करें पूजन!

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(how to perform pitru paksha)

हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी माना जाता है। मान्यतानुसार अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती । यह नियम १५ दिन के पितर पक्ष भर पुरी श्रद्धा भावना से करते है। जिन जिन तिथियो मे स्वजनो की मृत्यु हुई है। उसे पितर तिथि कहते है। लोक मान्यता है कि पितर तिथि के दिन वे स्वजन पितर बनकर आते है। इस पर्व मे अपने पूर्वजो के प्रति श्रद्धा,आस्था एवं आदर की झलक स्पष्ट दिखाई देता है। महामाया मंदिर रायपुर के पंडित मनोज शुक्ला ने बताया कि भादो माह के पूर्णिमा तिथि को भगवान गणेश जी के विसर्जन पुजा के साथ पितरो का स्वागत प्रारंभ होता है।


पितृ पक्ष का महत्त्व (what is importance of pitru paksha)

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानि पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली में पितृ दोष को सबसे जटिल दोषों में से एक माना जाता है। पितरों की शांति के लिए हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष श्राद्ध होते हैं। मान्यता है कि इस दौरान समस्त पितर गण धरती के एकदम समीप आ जाते हैं ताकि वह अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें।

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श्राद्ध क्या है? (pitru paksha rituals)

ब्रह्म पुराण के अनुसार जो भी वस्तु उचित काल या स्थान पर पितरों के नाम से उचित विधि द्वारा श्रद्धापूर्वक दिया जाए वह श्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध के माध्यम से पितरों को तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है। पिण्ड रूप में पितरों को दिया गया भोजन श्राद्ध का अहम हिस्सा होता है।

क्यों जरूरी है श्राद्ध देना? (importance of pitru paksha)

मान्यता है कि अगर पितर रुष्ट हो जाए तो मनुष्य को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पितरों की अशांति के कारण धन हानि और संतान पक्ष से समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। संतान-हीनता के मामलों में ज्योतिषी पितृ दोष को अवश्य देखते हैं। ऐसे लोगों को पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

क्या दिया जाता है श्राद्ध में? (do’s and don’ts during pitru paksha(

श्राद्ध में तिल, चावल, जौ आदि को अधिक महत्त्व दिया जाता है। साथ ही पुराणों में इस बात का भी जिक्र है कि श्राद्ध का अधिकार केवल योग्य ब्राह्मणों को है। श्राद्ध में तिल और कुशा का सर्वाधिक महत्त्व होता है। श्राद्ध में पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोज्य पदार्थ को पिंडी रूप में अर्पित करना चाहिए। श्राद्ध का अधिकार पुत्र, भाई, पौत्र, प्रपौत्र समेत महिलाओं को भी होता है।

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श्राद्ध में कौओं का महत्त्व (pitru paksha crow)
कौए को पितरों का रूप माना जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध ग्रहण करने के लिए हमारे पितर कौए का रूप धारण कर नियत तिथि पर दोपहर के समय हमारे घर आते हैं। अगर उन्हें श्राद्ध नहीं मिलता तो वह रुष्ट हो जाते हैं। इस कारण श्राद्ध का प्रथम अंश कौओं को दिया जाता है।



किस तारीख में करना चाहिए श्राद्ध?
सरल शब्दों में समझा जाए तो श्राद्ध दिवंगत परिजनों को उनकी मृत्यु की तिथि पर श्रद्धापूर्वक याद किया जाना है। अगर किसी परिजन की मृत्यु प्रतिपदा को हुई हो तो उनका श्राद्ध प्रतिपदा के दिन ही किया जाता है। इसी प्रकार अन्य दिनों में भी ऐसा ही किया जाता है। इस विषय में कुछ विशेष मान्यता भी है जो निम्न हैं:

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* पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन और माता का नवमी के दिन किया जाता है।
* जिन परिजनों की अकाल मृत्यु हुई जो यानि किसी दुर्घटना या आत्महत्या के कारण हुई हो उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है।
* साधु और संन्यासियों का श्राद्ध द्वाद्वशी के दिन किया जाता है।
* जिन पितरों के मरने की तिथि याद नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। इस दिन को सर्व पितृ श्राद्ध कहा जाता है।

रायपूर से प्रकाशित पंचांग के अनुसार वर्ष 2017 में पितृ पक्ष श्राद्ध की तिथियां निम्न हैं:

तारीख दिन श्राद्धतिथियाँ (pitra dosh dates and time)

5 सितंबर मंगलवार पूर्णिमाश्राद्ध

6 सितंबर बुधवार प्रतिपदाश्राद्ध

7 सितंबर गुरूवार द्वितीयाश्राद्ध

8 सितंबर शुक्रवार तृतीया श्राद्ध

9 सितंबर शनिवार चतुर्थी श्राद्ध

10 सितंबर रविवार पंचमी श्राद्ध

11 सितंबर सोमवार षष्ठी श्राद्ध

12 सितंबर मंगलवार सप्तमी श्राद्ध

13 सितंबर बुधवार अष्टमी श्राद्ध

14 सितंबर गुरूवार नवमी श्राद्ध

15 सितंबर शुक्रवार दशमी श्राद्ध

16 सितंबर शनिवार एकादशी श्राद्ध

17 सितंबर रविवार द्वादशी / त्रयोदशी श्राद्ध

18 सितंबर सोमवार चतुर्दशीश्राद्ध

19 सितम्बर मंगलवार अमावश्याश्राद्ध
पितृमोक्ष / सर्वपितृ अमावश्या

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