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जीवन परिचय : गुरु नानक देव जी कैसे बने सिख धर्म के पहले गुरु

सिख धर्म में दस गुरु हुए हैं, गुरुनानक देवजी (guru nanak dev ji)  सिख धर्म के पहले गुरू माने गए हैं. भरतीय संस्कृति में कहा गया है कि गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती है, आदिकाल से ही गुरू की महिमा का वर्णन वेद और ग्रंथों में मिलता है. गुरू व्यक्ति को सत मार्ग पर चलने का रास्ता दिखाता है और उसे ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग बताता है. गुरु और ईश्वर में गुरु को सर्वोच्च स्थान दिया गया है. क्योंकि ईश्वर तक जाने का रास्ता व्यक्ति को गुरु ही दिखाता है. गुरु की महिमा का वर्णन हिंदु धर्म के हर ग्रंथ में मिलता है.

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सिख धर्म के पहले गुरु नानकदेव भी लोगों को ईश्वर भक्ति के नए मार्ग तक जाने का रास्ता बताने इस धरती पर अवतरित हुए थे. आज हम आपको गुरू नानक देवीजी के जीवन के बारे में बताएंगे.

गुरु नानकदेवजी का जन्म 15 अप्रैल 1469 को राएभोए की तलवंडी नामक स्थान में हुआ था कल्याणचंद नाम के एक किसान के घर में गुरूनानक देवजी का जन्म हुआ था. इनकी माता का नाम तृप्ता था. तलवंडी वर्तमान में पाकिस्तान में है जो कि सिख धर्म का पवित्र स्थल है इसे अब ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है.

महज 13 साल की उम्र में ही गुरूनानक देव का उपनयन संस्कार हो गया था, जब उनकी उम्र 16 साल की थी तब उनका विवाह सुलखनी नाम की महिला से हुआ बाद में इनसे दो पुत्र हुए जिनका नाम श्रीचंद और लक्ष्मीचंद था.

33 साल की उम्र में साल 1499 में गुरूनानक देवजी ने संदेश देना प्रारंभ कर दिया था, वो यात्राएं करते थे और संदेश लोगों तक पहुंचाते थे. 1521 तक गुरूनानक देवजी ने भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के प्रमुख स्थानों की यात्राएं कर ली थीं. गुरूनानक देवजी ने लगभग दुनिया के हर हिस्से का भ्रमण किया और कई रोचक घटनाओं के साक्षी बने, गुरूनानक देवजी की यात्राओं को उदासियां के नाम से जाना जाता है.

गुरु गुरुनानक देवी जी के चार शिष्य मरदाना, रामदास, बाला और लहना थे, बाबाजी हमेशा इन चारों शिष्यों के साथ ही अपनी यात्राओं में जाया करते थे. गुरूनानक देवजी ने 28 साल में दो उपमहाद्वीपों की यात्रा की और 60 से ज्यादा शहरों का भ्रमण किया, गुरूनानक देवजी ने मक्का मदीना तक की यात्रा की है.

25 सितंबर, 1539 को गुरुनानक देवजी ने देह त्याग दी थी, देह त्यागने से पहले बाबाजी ने अपने शिष्य लहना को अपना उत्तराधिकारी बनाया था जिनहें लोग गुरू अंगद के नाम से जानते हैं.

गुरूनानक देवजी ने ही भारत को हिंदुस्तान नाम दिया था. कहते हैं जब 1526 में बाबर ने भारत पर आक्रमण किया था तब गुरु नानक देवजी ने कहा था

खुरासान खसमाना कीआ

हिंदुस्तान डराईआ।

नानकदेवजी ने हमेशा कुसंस्कारों और रुढ़िवादी परंपराओं के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की थी. उनके व्यक्तित्व में हर गुण विद्यमान था. संत साहित्य में नानक अकेले चमकते सितारे हैं.

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