गौतम बुद्ध : जिसने अपने मन को साधा वही सच्चा साधु

स्वप्निल व्यास, इंदौर @ प्रारंभ से प्रारब्ध

एक दिन भगवान गौतम बुद्ध ने सोचा अपने शिष्यों को दीक्षा देने के बाद उनकी परीक्षा ली जाए।उन्होंने शिष्यों से कहा,”तुम सभी जहाँ कहीं भी जाओगे वहाँ तुम्हें अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के लोग मिलेंगे।अच्छे लोग तुम्हारी बातों को गौर से सुनेंगे और तुम्हारी सहायता करेंगे।लेकिन बुरे लोग तुम्हारी निंदा करेंगे और तुम्हें गालियाँ देंगे।तुम्हे इससे कैसा लगेगा?”
एक गुणी शिष्य ने भगवान गौतम बुद्ध को जवाब दिया,”मैं तो किसी को बुरा नहीं समझता।यदि कोई मेरी निंदा करेगा या मुझे गालियाँ भी देगा तो मैं समझूंगा कि वह भला व्यक्ति है क्योंकि उसने मुझे सिर्फ गालियाँ ही दीं,कम से कम मुझ पर धूल तो नहीं फैंकी।”
भगवान गौतम बुद्ध ने पूछा,”और यदि कोई तुम पर धूल ही फैंक दे तो?”शिष्य ने कहा,”फिर भी मैं उसे भला ही कहूँगा क्योंकि उसने सिर्फ धूल ही तो फैंकी,थप्पड़ तो नहीं मारा।”भगवान गौतम बुद्ध ने फिर पूछा,”और यदि कोई थप्पड़ ही मार दे तो क्या करोगे?”

शिष्य ने उत्तर दिया,”मैं उन्हें बुरा नहीं कहूँगा क्योंकि उन्होंने मुझे थप्पड़ ही तो मारा,डंडा तो नहीं मारा।”यदि कोई डंडा मार दे तो?”भगवान गौतम बुद्ध ने पूछा।”तब मैं उसे धन्यवाद दूँगा क्योंकि उसने मुझे केवल डंडे से ही मारा,हथियार से तो नहीं मारा।”शिष्य ने जवाब दिया।तब भगवान् बुद्ध ने फिर पूछा,”लेकिन मार्ग में तुम्हें कभी डाकू भी मिल सकते हैं जो तुम पर घातक हथियार से प्रहार कर सकते हैं।तब क्या करोगे?”शिष्य ने कहा,”तो क्या?मैं तो उन्हें दयालू ही समझूँगा,क्योंकि वे केवल मारते ही हैं,मार नहीं डालते।””और यदि वे तुम्हें मार ही डालें तो?”भगवान गौतम बुद्ध ने प्रश्न किया।

swapnil vyas indore
लेखक स्वप्निल व्यास, इंदौर

शिष्य बोला,”इस जीवन और संसार में केवल दुःख ही हैं।जितना अधिक जीवित रहूँगा उतना अधिक दुःख देखना पड़ेगा।जीवन से मुक्ति के लिए आत्महत्या करना ही महापाप है।यदि कोई जीवन से ऐसे छुटकारा दिला दे तो उसका भी उपकार मानूँगा।” शिष्य के ऐसे वचन सुन कर भगवान् बुद्ध को अपार संतोष हुआ।वे बोले,”तुम धन्य हो।केवल तुम ही सच्चे साधु हो।सच्चा साधु किसी भी दशा में दूसरे को बुरा नहीं समझता।जो दूसरों में बुराई नहीं देखता वही सच्चा परिव्राजक होने के योग्य है। तुम सदैव धर्म के मार्ग पर चलोगे।”

वस्तुतः सच्चा साधु वो है जिसने अपने मन को साध लिया है।जिसके लिए मान-अपमान,लाभ-हानि,दुःख-सुख एक समान हैं।वो हर परिस्थिति में सम भाव रखता है।उसके मन में किसी के लिए द्वेष की भावना नहीं होती।वो सदैव अन्यों के लिए साधुवाद का भाव रखता है और अन्यों के प्रत्येक कृत्य को अपनी भलाई के लिए जान कर उसमें से अपने लिए अच्छा खोज लेता है।

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