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भगवान शांतिनाथ का संपूर्ण जीवन परिचय

जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हैं, भगवान शांतिनाथ (tirthankar shantinath) जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर हैं. आज हम आपको भगवान शांतिनाथ के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे.

जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ का इक्क्षवाकु कुल में हुआ था. ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भरणी नक्षत्र में कुरूजांगल प्रदेश के हस्तीनापुर नगर में भगवान शांतिनाथ ने जन्म लिया था. भगवान शांतिनाथ के जन्म लेते ही उनके राज्य में चारों तरफ शांति का वातावरण निर्मित हो गया था. भगवान शांतिनाथ अहिंसा, शांति, करूणा और अनुशासन के पर्याय माने जाते थे.

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भगवान शांतिनाथ के पिता विश्वसेन थे जो कि हस्तीनापुर के राजा थे. उनकी माता का नाम अचीरा था जिन्हें लोग ऐरा के नाम से भी जानते हैं. भगवान शांतिनाथ के एक भाई थे जिनका नाम चक्रायुध था वहीं उनके पुत्र का नाम नारायण था. भगवान शांतिनाथ पांचवें चक्रवर्ती राजा और बारहवें कामदेव माने जाते थे. एक बार दर्पण में उन्हें अपना चेहरा देखकर वैराग्य भाव का अनुभव हुआ. जिसके बाद उन्होंने सांसारिक सुखों का त्याग कर दिया और ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी को आम्रवन में दीक्षा ग्रहण कर ली. भगवान शांतिनाथ को पौष शुक्ला दशमी को केवल्यज्ञान की प्राप्त हुआ. ज्येष्ठ कृष्णा चौदस तिथि को श्री स्ममेद शिखर से भगवान शांतिनाथ ने मोक्ष की प्राप्ति की.

भगवान शांतिनाथजी के पूर्वजन्म की कथा (tirthankar shantinath)

भगवान शांतिनाथ के तीर्थंकर बनने को लेकर एक पौराणिक कथा का वर्णन मिलता है जिसके अनुसार कहा जाता है कि अपने पूर्वजन्म में किए गए सद्कर्मों के प्रताप के कारण भगवान शांतिनाथ जैन धर्म के तीर्थंकर बनें थे. पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शांतिनाथ अपने पूर्व जन्म में राजा मेघरथ थे. अपने दयालु और कृपालु स्वाभाव के कारण दूर-दूर तक उनकी प्रसिद्धि थी. वो अपनी प्रजा का परिवार की तरह ध्यान रखते थे और हमेशा उनकी मदद के लिए तैयार रहा करते थे.

कहते हैं एक बार राजा मेघरथ बैठे थे, तभी उनके पैर के पास आकर एक कबूतर गिर गया और उसने राजा से मनुष्य की बोली में बोलते हुए खुद के प्राणों की रक्षा करने की गुहार लगाई. कबूतर के पीछे वहां एक बाज आया, और उसने राजा से कहा कि वो कबूतर को छोड़ दें, वो कबूतर उसका भोजन है. राजा ने बाज से कहा कि वो कबूतर को उसे भोजन बनाने नहीं दे सकते क्योंकि कबूतर ने उनसे आकर प्राणों की रक्षा करने की गुहार लगाई है. उन्होंने बाज से कहा कबूतर को छोड़ दो और बाकी जीवों का शिकार करना भी बंद कर दो. जीव हत्या करना पाप है. राजा मेघरथ की बातों को सुनकर बाज ने कहा कि मांस उसका भोजन है बिना मांस खाए वो जीवित नहीं रह सकता, अगर भोजन के आभाव में वो मर गया तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा. बाज ने राजा से कहा कि यदि वो भूख से मर गया तो आपको पाप लगेगा. मैं भी आपकी शरण में हूं अब मेरी रक्षा की जिम्मेदारी भी आपकी है. बाज और कबूतर दोनों की बातें सुनकर राजा दुविधा में पड़ गए, कबूतर की जान बचाना भी जरूरी था और बाज को भोजन देना भी. राजा ने सोच विचारकर बाज से कहा कि वो कबूतर के बराबर मांस उसे देंगे. राजा ने तराजू मंगवाया एक तरफ कबूतर को रखा और दूसरी तरफ अपनी जांघ का मांस काटकर रखा, लेकिन उनका रखा मांस कबूतर के वजन से कम निकला, तब राजा ने अपनी दूसरी जांघ का मांस तराजू में रखा वो भी कबूतर के वजन के बराबर नहीं हुआ. राजा ने इसके बाद अपने दोनों बाजुओं का मांस तराजू में रख दिया लेकिन फिर भी कबूतर का वजन ज्यादा था. तब राजा ने बाज से कहा कि वो कबूतर को न खाए उसकी जगह राजा ने अपने पूरे शरीर का मांस बाज को सौंप दिया.

जब बाज और कबूतर ने राजा के आहार दान के रूप में स्वयं के शरीर का दान करते देखा तो दोनों देव रूप में प्रकट होकर राजा के सामने आए और श्रद्धा से राजा के सामने अपना शीश झुका दिया. उन देवों ने राजा से कहा कि राजा आप जीवों की रक्षा के लिए खुद की जान दे देते हैं आप देवतुल्य हैं, आपकी परीक्षा के लिए हम यहां रूप धर के आए थे, आप परीक्षा में सफल हुए हैं अगले जन्म में अपने सतकर्मो के फलस्वरूप आप तीर्थंकर के रूप में इस धरती पर जन्म लेंगे. दोनों देवताओं के आशीष से राजा के शरीर के सभी घाव भर गए, इस घटना के बाद राजा ने अपना राजपाट त्याग दिया और भगवान की भक्ति में लीन हो गए.

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