यह काम करने पर शुक्र देता है संजीवनी विद्या और मालामाल होने का वरदान

ज्योतिष शास्त्र में शुक्र ग्रह को प्रमुखता प्राप्त है। प्राचीन समय से ही ‘शुक्र’ को शुभ ग्रह मानते हुए समस्त मांगलिक कार्यों में इसकी शुभ स्थिति देखी जाती है। इसे ‘भोर का तारा’ तथा ‘सांयकाल का तारा’ भी मानते आये है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शुक्र दैत्यों के गुरु हैं। ये सभी विद्याओं व कलाओं के ज्ञाता हैं। ये संजीवनी विद्या के भी ज्ञाता हैं। यह ग्रह आकाश में सूर्योदय से ठीक पहले पूर्व दिशा में तथा सूर्यास्त के बाद पश्चिम दिशा में देखा जाता है।
शुक्र भगवान शंकर की घनघोर तपस्या कर वरदान में अमरत्व तथा मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की, यही कारण था कि शुक्र मरे हुये राक्षसों को पुनः जीवित कर देते थे। शुक्र प्राणीमात्र के ब्रह्मरन्ध्र में अमृत संचार करता है। दूसरा वरदान शुक्र के पास भगवान शंकर का यह था कि गुरु बृहस्पति से तीन गुना बल अधिक था और उसी बल के द्वारा उसने अतुल्यनीय बल और वैभव की प्राप्ति कर ली थी। अर्थात जो भी संपत्ति कोई कठिन परिश्रम से प्राप्त करे उसे वह साधारण से मार्ग से प्राप्त कर ले। तीसरा वरदान उसे शंकरजी से यह मिला कि सभी ग्रह ६, ८, १२ भाव में बलहीन हो जाते है और अपना प्रभाव नही दे पाते है, लेकिन शुक्र को वरदान मिला कि ६ भाव को छोडकर वह ८ और १२ में और अधिक बलवान हो जायेगा और जातक को अनुपातहीन सम्पत्ति का मालिक बना देगा। चैथा वरदान भगवान शंकर ने उसे दिया कि जो भी उसे मानेगा, उसकी सेवा और पूजा करेगा उसे वह उच्च पदासीन कर देगा, यह चार वरदान भगवान शंकर से शुक्र को प्राप्त हुये।

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एक आंख का माना जाता है शुक्र का रूप

भगवान शुक्राचार्य दैत्य गुरु है, दैत्य दानवों पर इनकी नित्य कृपा बनी रहती है। महाराजा बलि की सहायता के लिये शुक्राचार्य ने भगवान विष्णु को बामन अवतार धारण करते वक्त पृथ्वी को दान में न देने के लिये अपनी एक आंख फुडवा ली थी। तभी से शुक्र का रूप एक आंख का माना जाता है।



तब से ही यह माना जाता है कि माया की एक आंख होती है। शुक्र के सम्बन्ध के बारे में एक कथा और प्रचलित है कि जो व्यक्ति भोर का तारा यानी शुक्र के उदय के समय जागकर अपने नित्य कर्मों में लग जाता है, वह तो लक्ष्मी का धारक बन जाता है। इस प्रकार जो शुक्र को प्रबल कर लेता है वह संजीवनी विद्या का जानकार बन जाता है और जीवन में सभी संजीवन का उपभोग करता है। इस प्रकार बल और वैभव तथा संजीवन प्राप्त करने के लिए सूर्योदय से पूर्व एवं सूर्यास्त के उपरांत शुक्र के मंत्रों का जाप, शुक्र से संबंधित दान तथा व्रत करना, महामाया के दर्शन करना तथा दुर्गा कवच का पाठ करना चाहिए।

कुंडली में शुक्र पीड़ित होने निम्नलिखित उपाय लाभदायक होंगे 

ॐ शुम शुक्राय नमः का नियमित जाप करें।
प्रत्येक शुक्रवार को चावल की खीर कन्या को खिलाएं।
श्री सूक्त का प्रतिदिन पाठ करें।
किसी योग्य ज्योतिषी से परामर्श लेकर शुक्रवार को शुभ मुहूर्त में “ओपल या तुरमुली” रत्न धारण कर सकते हैं।

 

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