Home धर्म कथाएं नृसिंह जयंती पर ऐसे करें भगवान विष्णु का पूजन, पढ़ें पौराणिक कथा

नृसिंह जयंती पर ऐसे करें भगवान विष्णु का पूजन, पढ़ें पौराणिक कथा

वैशाख माह हिंदु कैलेंडर का एक अत्यंत पवित्र महीना माना जाता है इस महीने में भगवान विष्णु की आराधना करने का विशेष महत्व है. वैशाख माह में की गई भगवान विष्णु की आराधना से व्यक्ति को सभी सुखों की प्राप्ति होती है. वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान विष्णु ने नृसिंह भगवान के रूप में धरती पर अवतार लिया था इसलिए इस दिन नृसिंह जयंती (Narsingh Jayanti) मनाई जाती है. इस साल 25 मई को नृसिंह जयंती का पर्व मनाया जाएगा.

भगवान विष्णु ने अपने प्रिय भक्त प्रहलाद को उसके पिता हिरण्यकशिपु से बचाने के लिए इसी दिन खंभें से अवतार लिया था और हिरण्यकशिपु का वध कर अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा की थी. इस दिन धूमधाम से भगवान नृसिंह जयंती (Narsingh Jayanti) मनाई जाती है.

Do worship of Lord Vishnu on Narsingh Jayanti in this way, read the legend

नृसिंह जयंती (Narsingh Jayanti) पर कैसे करें भगवान विष्णु की पूजा

नृसिंह जयंती के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में सोकर उठें,

घर की साफ-सफाई करें, घर को पवित्र करने के लिए पूरे घर में गंगा जल छिड़कें या गौमूत्र का छिड़काव करें.

नृसिंह भगवान का मंत्र

नृसिंह देवदेवेश तव जन्मदिने शुभे।

उपवासं करिष्यामि सर्वभोगविवर्जितः॥

दोपहर के समय इस मंत्र का जप करते हुए क्रमशः तिल, गोमूत्र, मृत्तिका और आंवला शरीर पर मल कर अलग-अलग चार बार स्नान करें,ऐसा करने के बाद शुद्ध जल से स्नान करें.

पूजा के स्थान को गाय के गोबर से लीपकर स्वच्छ करें.

कलश में तांबा डालकर अष्टदल कमल बनाएं.

अष्टदल कमल पर भगवान नृसिंह और माता लक्ष्मीजी की स्थापना करें, स्थापना के बाद भगवान की प्राण- प्रतिष्ठा कर षोडशोपचार विधि से पूजन करें.

नृसिंह जयंती (Narsingh Jayanti) के दिन व्यक्ति को रात में जागरण कर भगवान की भक्ति करना चाहिए, रात में भगवान के भजन, गायन, वादन करें पुराण पढ़ें.

नृसिंह जयंती के दूसरे दिन पूजन कर ब्राह्मणों को भोजन कराएं व अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान दक्षिणा दें.

नृसिहं जयंती के दिन व्यक्ति को ब्रह्मचर्य का पालन एक दिन का व्रत करना चाहिए.

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नृसिंह भगवान का बीज मंत्र-

ॐ श्री लक्ष्मीनृसिंहाय नम:।।

नृसिंह अवतार की कथा-

अपने भाई हिरण्याक्ष के वध के बाद हिरण्यकशिपु ने भगवान शिव की कठोर आराधना की और भगवान से उसने अजेय होने का वर प्राप्त किया साथ ही उसे देवता, मनुष्य या पशु से न मरने का वरदान भी मिला. इस वरदान को पाकर हिरण्यकशिपु खुद को भगवान समझने लगा. जो लोग ईश्वर की आराधना करते थे वो उनको कठोर दंड देता था. उसके शासन से धरती वासी घबरा गए और भगवान से उसकी मुक्ति की प्रार्थना करने लगे. लोगों की प्रार्थना से खुश होकर भगवान विष्णु ने लोगों को उससे मुक्ति दिलाने का आश्वासन दिया.

हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का भक्त था, लेकिन उसे भी उसके पिता से ईश्वर भक्ति के लिए कठोर दंड मिलता. हिरण्यकशिपु अपने पुत्र को खुद को भगवान मानने के लिए कहता था. बचपन से ही प्रहलाद खेलने-कूदने की जगह भगवान विष्णु की आराधना करता था और साथ के बालकों को भी भगवान विष्णु के बारे में बताता था. जब हिरण्यकशिपु को पता चला कि उसका बेटा दूसरे दैत्य बालकों को धर्म का उपदेश देता है तो वो बहुत क्रोधित हुआ और उसने प्रहलाद को महल में बुलाया. और प्रहलाद से क्रोध में आकर पूछा कि तुम किसके कहने पर लोगों को विष्णु के ईश्वर होने का उपदेश देते हो. तब प्रहलाद ने अपने पिता से कहा कि वो भगवान के आदेश पर ही ऐसा करता है. दुनिया के सभी जीवों में भगवान का वास है वही इस सृष्टि को चलाता है और सभी जीवों की रक्षा करता है प्रहलाद की बातों को सुन कर हिरण्यकशिपु और ज्यादा क्रोधित हो गया, उसने प्रहलाद से पूछा कि बता तेरा विष्णु कहा छिपा है, प्रहलाद ने कहा पिताजी वो आपके अंदर हैं, महल की इस दीवार में हैं, महल के इस खंभे में भी है. प्रहलाद की बात सुनकर हिरण्यकशिपु ने खंभे पर गदा से प्रहार किया. तब खंभे से भगवान विष्णु नृसिंह अवतार में प्रकट हुए और उन्होंने अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु का पेट चीरकर उसका वध कर दिया. क्योंकि हिरण्यकशिपु को वरदान प्राप्त था कि वो न धरती में मरेगा न आकाश में, न ही घर के अंदर मरेगा, न ही घर के बाहर, न किसी अस्त्र से उसकी मृत्यु होगी, न किसी शस्त्र से, न दिन में मरेगा न ही रात में इसलिए भगवान विष्णु ने महल की दहलीज पर अपने नाखूनों से उसका वध किया था.

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