कड़वे प्रवचन देकर जिन्दगी में मिठास भरने वाले मुनि का अंतिम विहार

भावपूर्ण श्रद्धांजली @ स्वप्निल व्यास, इंदौरतुम्हारी वजह से जीते जी किसी की आंखों में आंसू आए तो यह सबसे बड़ा पाप है। लोग मरने के बाद तुम्हारे लिए रोए, यह सबसे बड़ा पुण्य है। इसीलिए जिंदगी में ऐसे काम करो कि, मरने के बाद तुम्हारी आत्मा की शांति के लिए किसी और को प्रार्थना नहीं करनी पड़े। क्योंकि दूसरों के द्वारा की गई प्रार्थना किसी काम की नहीं है। जैन मुनि तरुण सागर का शनिवार को सुबह निधन हो गया। 51 वर्षीय जैन मुनि लंबे समय से बीमार चल रहे थे।

ब्राह्मण का सबसे बड़ा उत्सव है श्रावणी उपकर्म : रक्षाबंधन का यह भी एक रूप

श्रावणी उपाकर्म ब्राह्मणों व द्विज का सबसे बड़ा पर्व हैं। श्रावण मास के अंतिम दिन पूर्णिमा पर यह उत्सव मनाया जाता हैं श्रावणी उपाकर्म द्विज के शरीर मन और आत्मशुद्धि की क्रियाओं के साथ यज्ञोपवीत बदलें जाते हैं। इस दिन पुराना यज्ञोपवीत बदल कर नया धारण करते हैं, अर्थात् उस जिम्मेदारी को नए सिरे से स्मरण करते हैं। वैदिक काल से पवित्र नदियों के तट पर आत्मशुद्धि का यह उत्सव मनाया जा रहा हैं, इस कर्म में आंतरिक व ब्राह्य शुद्धि गोबर, मिट्टी, भस्म, अपामार्ग, धृत, गोमूत्र, प्राशन कर शरीर

स्वतंत्रता दिवस विशेष : हमें गर्व है हमारे ज्ञान से दुनिया को विज्ञान मिला

स्वप्निल व्यास @ इंदौर. लोग यह मानते या कहते पाए गए हैं कि पश्चिम ने विश्व को विज्ञान दिया और पूर्व ने धर्म | दूसरी ओर हमारे ही भारतीय लोग यह कहते हुए भी पाए गए हैं कि भारत में कोई वैज्ञानिक सोच कभी नहीं रही | ऐसे लोग अपने अधूरे ज्ञान का परिचय देते हैं या फिर वे भारत विरोधी हैं| भारत के बगैर न धर्म की कल्पना की जा सकती है और न विज्ञान की| हमारे भारतीय ऋषि-मुनियों और वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसे आविष्कार किए और सिद्धांत गढ़े हैं

आपका दिल रो देगा इस महान संत की यह सच्ची दास्तां पढक़र…

स्वप्निल व्यास @ गजानन महाराज महाराष्ट्र के शेगांव जिले के एक संत है. कुछ विद्वानों के मतानुसार वो भगवान गणेश और अत्रिपुत्र दत्तात्रय के अवतार हैं. वैसे तो उनके जन्म के बारें में कोई सटीक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं लेकिन कहा जाता हैं कि उन्हें 23 फरवरी 1878 को शेगांव के एक जमीनदार ने बरगद के पेड़ के नीचे झूठी पत्तलों से चावल के दाने उठाकर खाते हुए देखा था, तब जमीनदार ने पूछा था झूठी पत्तलों से भोजन क्यों खा रहे हैं. तब गजानन महाराज ने उत्तर दिया –

गुरु पूर्णिमा वंदन: घोड़ी की लीद के नौ गोले और नवधा भक्ति

स्वप्निल व्यास, इंदौर @ पूना के एक महाशय, श्री. अनंतराव पाटणकर श्री साईबाबा के दर्शनों के इच्छुक थे । उन्होंने शिरडी आकर बाबा के दर्शन किये । दर्शनों से उनके नेत्र शीतल हो गये और वे अति प्रसन्न हुए । उन्होंने बाबा के श्री चरण छुए और यथायोग्य पूजन करने के उपरान्त बोले, मैंने बहुत कुछ पठन किया । वेद, वेदान्त और उपनिषदों का भी अध्ययन किया तथा अन्य पुराण भी श्रवण किये, फिर भी मुझे शान्ति न मिल सकी । इसलिये मेरा पठन व्यर्थ ही सिदृ हुआ ।एक निरा

इस दुनिया में सिर्फ दो ही मूर्ख है, महाकवि कालिदास के बाद दुनिया में कौन मूर्ख बचे? आप जानते हैं?

स्वप्निल व्यास @ यह तो सर्वविदित है कि कालिदास शुरू में निपट मूर्ख थे। मां काली के वरदान से वह प्रकांड विद्वान बन सके और उन्हें ढेर सारी विद्या मिल गई। उन्हें शास्त्रार्थ में कोई परास्त नहीं कर पाता था। कहा जाता था कि उनके कंठ में साक्षात मां सरस्वती का वास था। भवभूति से विवाद होने पर मां सरस्वती ने ही दोनों के बीच विद्वता की व्यवस्था देते हुए घोषणा की थी कि मैं ही कालिदास हूं। जाहिर है कि असाधारण ज्ञान और उसके बल पर पर मिले अपार

101 साल बाद मां काली का प्रकोप हुआ शांत, इन राशियों को देंगी वरदान, होगी मनोकामनाएं पूरी :o

नमस्कार दोस्तों आप सभी लोगों का हमारे लेख में स्वागत है दोस्तों व्यक्ति की राशियों का जीवन में बहुत बड़ा महत्व होता है राशियों के आधार पर ही व्यक्ति के आने वाले समय के बारे में पता लगाया जा सकता है इन राशियों के माध्यम से ही व्यक्ति के आने वाले समय में किन किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा उसको अपने जीवन में सफलता प्राप्त होगी या नहीं उसके जीवन में क्या-क्या घटनाएं घटने की संभावना है इसी प्रकार की बहुत सी बातें हैं जो व्यक्ति की राशियों के

गुरु आज्ञा मान बच्चों को जिंदा जमीन में गाड़ दिया

स्वप्निल व्यास @ प्रारंभ से प्रारब्ध तक. महाराष्ट्र में औरंगाबाद से आगे येहले गाँव में संत तुकाराम चैतन्य रहते थे, जिनके लोग प्रेम से 'तुकामाई' कहते थे। वे ईश्वरीय सत्ता से जुड़े हुए बड़े उच्चकोटि के संत थे। 19 फरवरी 1854 को बुधवार के दिन गोंदवाले गाँव में गणपति नामक एक बालक का जन्म हुआ जब वह 12 वर्ष का हुआ तब तुकामाई के श्रीचरणों में आकर बोलाः 'बाबाजी ! मुझे अपने पास रख लीजिये।'तुकामाई ने क्षणभर के लिए आँखे मूँदकर उसका भूतकाल देख लिया कि यह कोई साधारण आत्मा नहीं

गधे को पिलाया गंगाजल…, रामेश्वरम का अभिषेक हो गया!

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स्वप्निल व्यास @ प्रारंभ से प्रारब्ध तक संत एकनाथ का जन्म महाराष्ट्र के पैठण में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री सूर्यनारायण तथा माता का नाम रुक्मिणी था। एकनाथ अपूर्व संत थे। वे श्रद्धावान तथा बुद्धिमान थे। उन्होंने  अपने गुरु से ज्ञानेश्वरी, अमृतानुभव, श्रीमद्भागवत आदि ग्रंथों का अध्ययन किया।वे एक महान  संत होने के साथ-साथ कवि भी थे। उनकी रचनाओं में श्रीमद्भागवत एकादश स्कंध की  मराठी-टीका, रुक्मिणी स्वयंवर, भावार्थ रामायण आदि प्रमुख हैंवह स्वभाव से अत्यंत सरल और परोपकारी थे। एक दिन उनके मन में विचार आया कि प्रयाग पहुंचकर त्रिवेणी

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