किसने और क्यों मारी भगवान विष्णु को लात

पौराणिक काल में प्रसिद्ध ऋषि हुआ करते थे, जिनका नाम था महर्षि भृगु। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ भृगु संहिता उतना ही प्रासंगिक है, जितना प्राचीन समय में था। ज्यादातर लोगों ने सुना होगा कि महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु को लात मारी थी। लेकिन इसके पीछे की असली वजह किसी को पता नहीं होगी। तो आइए आज हम आपको बताते हैं इसके पीछे का असली कारण।प्राचीन समय की बात है एक राक्षस समुद्र तल में जा छुपा था तो भगवान शिव के कहने पर भृगु ऋषि ने पूरा सागर ही गटक लिया। लेकिन ऋषि

कैसे हुई माँ लक्ष्मी की उत्पत्ति, एक अद्भुत रहस्य

प्राचीन भारतीय ग्रंथों के अध्ययन से लक्ष्मी की उत्पत्ति के विषय में अनेक तथ्य प्रकाश में आते हैं। भारतीय संस्कृति के प्राचीनतम लिखित साहित्य ऋग्वेद में लक्ष्मी की उत्पत्ति का आभास श्रीसूक्त द्वारा लिखा है। जहां उन्हें ‘पद्मसम्भवा’ कहा गया है।लक्ष्मी की उत्पत्ति संबंधी प्रचलित कथाओं एवं आख्यानों में समुद्र मंथन की कथा का महत्वपूर्ण स्थान है। यह रोचक कथा रामायण, महाभारत, भागवत, ब्रह्मवैवर्त, मत्स्य, पद्म एवं विष्णुधर्मोत्तर आदि पुराणों तथा नैषध-काव्य के समान अनेक ग्रंथों में उपलब्ध है। लक्ष्मी के जन्म से संबंधित समुद्र मंथन की कथा विष्णु महापुराण

घर में ‘तुलसी’ रखने से पहले रखें इन बातों का ध्यान,वरना हो जाएंगे बर्बाद

प्राचीन काल से ही यह परंपरा चली आ रही है कि घर में तुलसी का पौधा होना चाहिए। शास्त्रों में तुलसी को पूजनीय, पवित्र और देवी स्वरूप माना गया है। इस कारण घर में तुलसी हो तो कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। यदि ये बातें ध्यान रखी जाती हैं तो सभी देवी-देवताओं की विशेष कृपा हमारे घर पर बनी रहती है। घर में सकारात्मक और सुखद वातावरण बना रहता है। पैसों की किल्लत नहीं होती है और परिवार के सदस्यों को स्वास्थ्य अच्छा रहता है।शास्त्रों के अनुसार एकादशी, रविवार

पितृ पक्ष: श्राद्ध में पितरों का तर्पण करते समय इन बातों का रखें विशेष ध्यान

भारतीय संस्कृति और शास्त्रों में मृत्यु और पुर्नजन्म की व्याख्या बहुत ही विस्तृत रूप से बताई गई है जिसके मुताबिक मृत्यु के बाद केवल शरीर नष्ट होता है,लेकिन आत्मा अमर रहती है। जो मृत्यु के बाद फिर से जीवन चक्र में और जन्म लेती है जिसे पुर्नजन्म कहा जाता है। पितृदोष की शुरूआत भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की प्रथमा से होती है और समाप्ति अमावस्या के अंतिम श्राद्ध से होती है।आपको बता दें कि हिन्दू शास्त्रों में जीवित लोगों के साथ-साथ मृत व्यक्तियों को भी भोजन और तर्पण के जरिए

जहां झुकते हैं हिंदू मुसलमान, दोनों के सिर

राजस्थान में जैसलमेर से क़रीब 12 किलोमीटर दूर रामदेवरा में मध्यकालीन लोक देवता बाबा रामदेव के दर्शन के लिए इन दिनों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है.सांप्रदायिक सदभाव के प्रतीक माने जाने वाले इस लोक देवता की समाधि के दर्शन के लिए विभिन्न धर्मों को मानने वाले, ख़ास तौर पर आदिवासी श्रद्धालु देश भर से इस सालाना मेले में आते हैं.   पढ़िए विस्तार से बाबा रामदेव को कृष्ण भगवान का अवतार माना जाता है.उनकी अवतरण तिथि भाद्र माह के शुक्ल पक्ष द्वितीय को रामदेवरा मेला शुरू होता है. यह मेला एक महीने

हमारी संस्कृति में श्रद्धा तत्व को जीवित रखने का उत्सव है श्राद्ध

स्वप्निल व्यास, इंदौर @ प्रारंभ से प्रारब्ध भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म में श्राद्ध का अपना विशेष स्थान है। श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है और उसी से उसके गुप्त तात्पर्य पर प्रकाश पड़ता है। सत्कर्मों के लिए, सत्पुरुषों के लिए आदर की, कृतज्ञता की भावना रखना श्रद्धा कहलाता है। जिस व्यक्ति ने हमारे साथ उपकार किया है, हम उसका श्रद्धा सहित स्मरण करते हैं। इस स्मरण में भजन-पूजन के साथ-साथ भोजन की व्यवस्था भी रहती है। यह सम्मिलित रूप श्रद्धा कहलाता है। श्राद्ध एक प्रकार से मृत पूज्य व्यक्तियों के

पितृ पक्ष 2018ः पितृ दोष से बचने के लिए 16 दिन न करें ये काम, पितरों को मिलेगी शांति

देश में भाद्रपक्ष की शुल्क पक्ष की पूर्णिमा से दिन पितृ पक्ष यानि श्राद्ध शुरू होते हैं और आश्विन अमावस्या तक 16 दिन श्राद्ध किए जाते है। लोगों का ऐसा मानना है कि पितृपक्ष में पितरों की आत्मा धरती पर आती है।शास्त्रानुसार हिंदू धर्म में प्रत्येक व्यक्ति को अपने पितृों के मध्यान्ह व्यापिनी तिथि के अनुसार उनके श्राद्ध कार्य करने चाहिए। संसार में माता-पिता साक्षात देवता माने जाते हैं।इसलिए उनकी आत्मा की शांति के लिए आश्विन पक्ष में श्राद्धपूर्ण भाव से मनाना चाहिए। पूर्वजों के स्वर्गवास तिथि को ही श्राद्ध कार्य

श्राद्ध कौन हैं पितृगण? महिलाएं भी कर सकती हैं पितृ तर्पण

हमारे पूर्वज ही हमारे पितृगण हैं।हमारे पितृदेवता श्राद्धपक्ष में सूर्य के उदित होते ही सूक्ष्म-शरीर के रूप में (वायुरूप) सूर्य की रश्मियों पर सवार हो हमारे दरवाजे पर आकर खडे हो जाते हैं। जब उनका पुत्र उन्हें संकल्प सहित आमंत्रित करता है तभी वह ग्रह प्रवेश करते हैं ।और अपना भाग वायुरूप में ग्रहण कर सूर्य की वापस होती किरणों के साथ पितृ लोक को चले जाते हैं। जो पुत्र पितृऋण के तहत तर्पण नहीं करता तो पितर दुःखित कातर हो अपने पुत्र को श्रापित कर चले जाते हैं।पितृपक्ष के 15

गीता का ये उपदेश, देता हर काम में सफल होने का संदेश

बड़े-बुजुर्गों को कहते सुना होगा कि गीता में जीवन का सार है। श्री कृष्ण ने महाभारत युद्ध में अर्जुन को कुछ उपदेश दिए थे, जिससे उस युद्ध को जीतना पार्थ के लिए आसान हो गया।गीता के उपदेशों को अपनी जिंदगी में शामिल करके आप भी अपने लक्ष्य को पाने में सफल हो सकते हैं। गीता के उपदेशों में कहा गया है कि गुस्से पर काबू करना चाहिए। 'क्रोध से भ्रम पैदा होता है। भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है, जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है।जब

जानिए रामायण के 3 मूल मंत्र, न जानने वाला होता है असफल

हिंदू धर्म में जितने भी वेद या पुराण है माना जाता है कि उन्हें पढ़ने से मनुष्य की हर समस्या का हल निकल जाता है।जैसे भगवद् गीता, महाभारत, रामचरित मानस, रामायण शिवपुराण और रामायण आदि को पढ़ने के बाद कुछ न कुछ ज्ञान जरूर मिलता है और यदि कोई मनुष्य चिंताओं में घिरा हुआ है तो उसकी चिंता का समाधान तुरंत हो जाता है।  ऐसी कुछ पंक्तियां रामायण में लिखी हुई हैँ। जिन्हें जानने के बाद ज्ञान का बोध होता है और व्यक्ति जीवन की तमाम समस्याओं से ऊपर उठकर सफलता

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