600 साल पुरानी अनूठी धार्मिक परंपरा, ढाई माह दशहरे का जश्न फिर भी रावण जिंदा!

unique traditions of bastar dussehra festival in hindi

(exclusive story of bastar dussehra jagdalpur in chhattisgarh)

बस्तर. बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक दशहरा त्योहार देशभर में बड़े उत्साह से मनाया जाता हैं। देशभर में सब जगह रावण क पुतला जलाकर दशहरा मनाया जाता हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर में आज भी एक ऐसी धार्मिक परंपरा हैं, जिसके तहत दशहरे का त्योहार अलग ढंग से मनाया जाता हैं। यहां आज भी 600 साल पुरानी प्राचीन अनूठी परंपरा जिंदा हैं।


इसके मुताबिक ढाई महीनों तक दशहरा तो मनाया जाता हैं, लेकिन रावण नहीं मारा जाता हैं। आईए जानते हैं, क्या वजह हैं, इस परंपरा के पीछे…

भगवान राम ने दंडकारण्य में बिताए 10 साल

इस पर्व के पीछे धार्मिक मान्यता हैं कि भगवान राम ने करीब 10 साल तक दंडकारण्य में बिताए थे। छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र प्राचीनकाल में दंडकारण्य के रुप में पहचाना जाता था। यहां का ऐतिहासिक दशहरा राम के लंका पर जीत पाने के कारण नहीं मनाते है। यहां दशहरे पर बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की खास पूजा होती हैं। पूजा के तहत विशाल रथ सजाया जाता है। इसमें छत्र रखकर नवरात्रि के दौरान भ्रमण के लिए निकलता हैं।

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unique traditions of bastar dussehra festival

नवरात्रि से 75 दिन तक मनाते है दशहरा

बस्तर दशहरे का खास आकर्षण यहां के आदिवासियों के हाथों से तैयार किा गया बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी का विशाल रथ होता हैं। इसे बगैर आधुनिक तकनीक की मदद से तैयार किया जाता हैं। इसके बाद मां दंतेश्वरी का छत्र सजाया जाता हैं। दशहरे के दिन भीतर रैनी और एकादशी के दिन बाहर रैनी की रस्म निभाई जाती हैं। नवरात्र पर रथ परिक्रमा शुरु होती हैं। पहले दिन मिरगान जाति की एक छोटी बच्ची काछन देवी बनती हैं। उसे कांटे के एक झूले पर बिठाया जाात हैं। इस परंपरा को काछन गादी कहा जाता हैं। काछन देवी बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति देती हैं। इसके बाद देवी मां की प्रतिमा के सामने जमीन पर गढ्डा खोदाकर एक जोगी को बैठाते हैं। 9 दिन तक वह वहां से नहीं उठ पाता हैं। इस समय में वह फल व दूध ले सकता है।


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