सूर्य ग्रहण की पौराणिक कथा, जब इस 1 बात पर क्रोधित हो गए थे भगवान विष्णु

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गुरवार 15 फरवरी 2018 को आधी रात के बाद से सूर्य ग्रहण शुरु हो जाएगा। यह 2018 का पहला सूर्य ग्रहण होगा। अभी 31 जनवरी को ही चंद्र ग्रहण लगा था और भारत में इसे देखा गया था। अब सूर्य ग्रहण ने दस्तक दे दी है। लेकिन सूर्य ग्रहण अर्जेटीना, चिली, पैराग्वे और उरुग्वे में ही देखा जा सकेगा। वहीं भारत के लोग NASA की वेबसाइट पर सूर्य ग्रहण को लाइव देख सकते हैं। इसी साल आंशिक सूर्य ग्रहण 18 जुलाई व 11 अगस्त को होंगे। पर इन्हें भी भारत में नहीं देख सकेंगे।

 

सूर्य ग्रहण पौराणिक कथा surya grahan pauranik katha in hindi

मत्स्यपुराण के अनुसार राहु (स्वरभानु) नामक दैत्य द्वारा देवताओं की पंक्ति मे छुपकर अमृत पीने की घटना को सूर्य और चंद्रमा ने देख लिया और देवताओं व जगत के  कल्याण हेतु भगवान सूर्य ने इस बात को श्री हरि विष्णु जी को बता दिया और इस पर भगवान विषणु के क्रोध आ गया था। जिससे भगवान उसके इस अन्याय पूर्ण कृत से उसे मृत्यु दण्ड देने हेतु सुदर्शन चक्र से वार कर दिया। परिणामतः उसका सिर और धड़ अलग हो गए। जिसमें सिर को राहु और धड़ को केतु के नाम से जाना गया। क्योंकि छल द्वारा उसके अमृत पीने से वह मरा नहीं और अपने प्रतिशोध का बदला लेने हेतु सूर्य और चंद्रमा को ग्रसता हैं, जिसे हम सूर्य या चंद्र ग्रहण कहते हैं। इस तथ्य की पुष्टि इस श्लोक द्वारा होता है-
तस्य  कण्ठमनुप्राप्ते दानवस्यामृते तदा।
आख्यातं चंद्रसूर्याभ्यां सुराणां हितकाम्यया।।
वैदिक व पौराणिक ग्रथों में ग्रहण के संदर्भ में कहा गया है। कि ग्रहण काल मे सौभाग्यवती स्त्रियों को सिर के नीचे से ही स्नान करना चाहिए, अर्थात् उन्हें अपने बालों को नहीं खोलना चाहिए, जिन्हें ऋतुकाल हो ऐसी महिलाओं को जल स्रोतों में स्नान नहीं करना चाहिए। उन्हे जल स्रोतों से बाहर स्नान करना चाहिए। सूतक व ग्रहण काल में देवमूर्ति को स्पर्श कतई नहीं करना चाहिए। ग्रहण काल में भोजन करना, अर्थात् अन्न, जल को ग्रहण नहीं करना चाहिए। सोना, सहवास करना, तेल लगाना तथा बेकार की बातें नहीं करना चाहिए। बच्चे, बूढे, रोगी एवं गर्भवती स्त्रियों को आवश्यकता के अनुसार खाने-पीने या दवाई लेने में दोष नहीं होता है। सावधानी-गर्भवती महिलाओं को होने वाली संतान व स्व के हित को देखते हुए यह संयम व सावधानी रखना जरूरी होता है कि, वह ग्रहण के समय में नोकदार जैसे सुई व धारदार जैसे चाकू आदि  वस्तुओं का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इस समय उन्हें प्रसन्नता से रहते हुए भगवान के चरित्र को स्मरण करना चाहिए। रोना चिल्लाना, झगड़ना व अप्रसन्नता से बचना चाहिए, साथ ही ग्रहण के दुष्प्रभाव से बचने हेतु लाल रंग वाले गेरू को पानी में मिलाकर उदरादि स्तनों में थोड़ा सा लगाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार ग्रहण के एक दिन पहले और ग्रहण के दिन तथा इसके पश्चात् तीन से चार दिनों तक किसी शादी व मंगल कार्य को व किसी व्रत की शुरूआत तथा उसका उद्यापन वर्जित रहता है। अर्थात् देव व संस्कृति में आस्था रखने वालों को यथा सम्भव नियमों का पालन करना चाहिए। जिन्हें लगता है, कि इससे कुछ नहीं होता उन्हें ग्रहण से संबंधित पुराणों व साहित्यों को पढ़ना चाहिए फिर उसके निष्कर्ष को लोगों के मध्य प्रस्तुत करना चाहिए।


ग्रहण का यह है समय

इस साल का पहला सूर्य ग्रहण 15 फरवरी की रात 12 बजकर 25 मिनट पर शुरु होगा। अगले दिन 16 फरवरी की सुबह चार बजे ग्रहण का मोक्ष होगा। यह ग्रहण रात में होने की वजह से भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं दिखेगा। मगर इसका असर राशियों पर पड़ना तय है।

सूर्य ग्रहण भारतीय समयानुसार, १५ फरवरी रात्रि १२. २५ मिनट (१६ फरवरी 00.२५ ) से १६ फरवरी सुबह ४.१७ तक रहेगा। भारत में यह सूर्य ग्रहण नहीं दिखाई देगा। सूर्य ग्रहण दक्षिण जार्जिया, प्रशांत महासागर, चिली, ब्राजील और अंटार्कटिका आदि देशों में दिखाई देगा।

पानी और खाने के बर्तन में दुर्वा घास डालना चाहिए

आम तौर पर दुर्वा घास का इस्तेमाल पूजा के अवसर पर किया जाता है क्योंकि इसको पवित्र माना जाता है। ज्योतिषियों का मानना है कि दुर्वा घास को पानी में डालने से वह पवित्र हो जाता है।  दुर्वा घास में रोगाणुनाशक गुण होता है जो खाना या पानी को रोगाणुमुक्त रखने में मदद करता है। सूर्य ग्रहण के दौरान सूर्य का प्रकाश कम हो जाने के कारण जीवाणु का पनपना बढ़ जाता है। इसलिए ग्रहण के दौरान दुर्वा घास पका हुआ खाना या पीने के पानी में दुर्वा घास डालने पर वो संदूषित (contamination) नहीं होता है।
ग्रहण के दौरान कोई भी पका हुआ खाना संग्रह करके न रखें- इस मान्यता के पीछे विज्ञान ये है कि ग्रहण के दौरान जीवाणुनाशक पराबैंगनी विकिरण अनुपलब्ध होते हैं जो रोगाणु को पनपने से रोकने में मदद करते हैं। इसलिए ग्रहण के दौरान पका हुआ खाना संग्रह करने पर उनके खराब होने की संभावना तीव्र होती है।

ग्रहण के बाद नहाना चाहिए

ये भारतीय मान्यता है कि ग्रहण के पहले या बाद में राहु का दुष्प्रभाव रहता है जो नहाने के बाद ही जाता है। इस मान्यता के पीछे भी एक विज्ञान है। सूर्य के अपर्याप्त रोशनी के कारण जीवाणु या कीटाणु ज्यादा पनपने लगते हैं जिसके कारण इंफेक्शन होने की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है। इसलिए ग्रहण के बाद नहाने से शरीर से अवांछित टॉक्सिन्स निकल जाते हैं और बीमार पड़ने के संभावना को कुछ हद तक दूर किया जा सकता है।

ग्रहण के दौरान उपवास करना चाहिए

ग्रहण प्रेरित गुरुत्वाकर्षण के लहरों के कारण ओजोन के परत पर प्रभाव पड़ने और ब्रह्मांडीय विकिरण दोनों के कारण पृथ्वीवासी पर कुप्रभाव पड़ता है। इसके कारण ग्रहण के समय जैव चुंबकीय प्रभाव बहुत सुदृढ़ होता है जिसके प्रभाव स्वरूप पेट संबंधी गड़बड़ होने की ज्यादा आशंका रहती है। इसलिए शरीर में किसी भी प्रकार के रासायनिक प्रभाव से बचने के लिए उपवास करने की सलाह दी जाती है। इसके साथ मंत्रोच्चारण करने से मन शांत रहता है और व्यक्तिगत कंपन के प्रभाव को भी कुछ हद तक कम किया जा सकता है। अब शायद आपने मान ही लिया होगा कि हर भारतीय मान्यता या रिवाज़ के पीछे वैज्ञानिक कारण होता है।

 

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