कवर्धा का भोरमदेव मंदिर: सूर्य की पहली किरण से जगमगाती है गर्भगृह में भगवान शिव की प्रतिमा

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कवर्धा.
10 वीं सदी का भोरमदेव मंदिर देवताओं और मानव आकृतियों की उत्कृष्ट नक्काशी के साथ मूर्तिकला का चमत्कार के कारण सभी की आंखों का तारा है। यहां पूजन करने के लिए हर वर्ष देश ही नहीं बल्कि कई देखों के श्रद्धालु पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस मंदिर का नाम भगवान शिव के नाम है। स्थानीय बोली में शिव का दूसरा नाम भोरमदेव भी है। गर्भगृह में मुख्य प्रतिमा एक शिवलिंग की है।



छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 130 किमी दूर और कवर्धा जिले से 17 किमी दूरी पर स्थित भोरमदेव मंदिर प्राकृतिक वातावरण में बसा है, जो भोरमदेव वन्यजीव अभ्यारण मुश्किल से एक किमी की दूरी पर है।

सूर्य की पहली किरण से जगमगाती है गर्भगृह की प्रतिमा (garbhagriha of bhoramdeo temple kawardha chhattisgarh)

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हिंदू मंदिरों की तर्ज पर यहां भी भोरमदेव मंदिर पूर्वी मुहाने पर हैं। इस वजह से उगते सूर्य की पहली किरण से गर्भगृह में प्रतिष्ठापित प्रतिमा जगमगा उठती है। भगवान गणेश हनुमान, शिव देवता की मूर्ति मंदिर के आलों में से प्रत्येक में प्रतिष्ठापित है। अन्य मंदिरों से अलग इन मूूर्तियों की खुदाई अलग-अलग की गई है। ये ग्रेनाइट से बनी या फिर शिस्त पत्थर से बनाई गई है फिर आलो में रखी गई।

शिव का दूसरा नाम है भोरमदेव (lord shiva in bhoramdeo temple kawardha chhattisgarh)

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भोरमदेव का मंदिर 7 वीं से 10 वीं सदी का है। मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका नाम गोंड राजा भोरमदेव के नाम पर पड़ा है। स्थानीय किस्सों के अनुसार इस मंदिर को राजा ने ही बनवाया था।



मंदिर के गर्भगृह में एक मूर्ति है, जो मान्यता के अनुसार राजा भोरमदेव की है, हालांकि इसे सिद्ध करने के लिए कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। धार्मिक मान्यता है कि इस मंदिर का नाम भगवान शिव के नाम पर पड़ा है। स्थानीय बोली में शिव का दूसरा नाम भोरमदेव भी है। गर्भगृह में मुख्य प्रतिमा एक शिवलिंग की है।

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