मदुराई के मीनाक्षी मंदिर से जुड़ी है पौराणिक कथा

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मदुराई. दक्षिण भारत के श्रेष्ठ मंदिरों में से एक हैं तमिलनाडु के मदुराई में स्थित मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर। इस मंदिर में दर्शन के लिए देश ही नहीं विदेशों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यहां विश्व की सर्वश्रेष्ठ शिल्पकला, पेंटिंग एवं रंगों का अद्भुत प्रयोग दिखाई देता हैं। यह मंदिर स्थापत्य और वास्तुकला के हिसाब से आधुनिक विश्व के आश्चर्यों में गिना जाता है। यह मंदिर भगवान सुन्दरेश्वर (शिव) की भार्या जिनकी आंखे मछली की आंखों जैसी सुंदर है, उन्हें समर्पित हैं।
मंदिर के विशाल प्रांगण में सुंदरेश्वर (शिव मंदिर समूह) और बाईं और मीनाक्षी देवी का मंदिर हैं। शिव मंदिर समूह में भगवान शिव की नटराज मुद्रा में आकर्षक प्रतिमा है।



यह प्रतिमा एक रजत वेदी पर स्थित है। यहां भगवान गणेश की भी प्रतिमा है। मीनाक्षी देवी मंदिर में मीनाक्षी की पूर्वाभिमुख श्यामवर्णा अत्यंत सुंदर प्रतिमा है।

नवविवाहित युगल करते हैं यहां प्रार्थना

मंदिर के पास में ही स्वर्ण पुष्करणी नामक बेहद आकर्षक सरोवर है। यहां चारों और बनें मंडपों में आकर्षक चित्र बने हुए हैं। फरवरी माह में देवी मीनाक्षी तथा भगवान सुंदरेश्वर की प्रतिमाओं को सजाकर यहां नौका विहार करवाया जाता हैं। यहीं पर शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। इसलिए यहां नवविवाहिता युगल अपने सुखी दांपत्य जीवन की प्रार्थना करने आते हैं। यहां कई जोड़े मंदिर प्रांगण में हार-फूल पहने घूमते देखे जा सकते हैं।

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सौनका महर्षि ने तपस्या की थी यहां  maharshi

इस मंदिर की एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध हैं। एक बार यहां सौनका महर्षि तपस्या कर रहे थे, घोर तपस्या की वजह से उन पर चींटियों ने उन पा बांबी बना ली। वहां खेल रही यायाति की पुत्री की नजर बांबी पर पड़ी। बांबी से निकल रही ज्योतियों से वह आकर्षित होकर पास में गई। यह ज्योति महर्षि के नेत्र थे, जो चमक रहे थे।



यायाति की पुत्री ने पास से एक लकड़ी उठाई और महर्षि के नेत्र में चुभो दी। कुरद्ध होकर महर्षि ने उसे श्राप दे दिया कि तेरी सारी संतानें दृष्टिहीन पैदा होंगी। यायाति की पुत्री ने महर्षि से प्रार्थना की और बताया कि यह भूलवश हुआ है, तब महर्षि का क्रोध शांत हुआ। श्राप मुक्ति के लिए महर्षि ने ही उससे विवाह रचाया। उनके सौ संताने पैदा हुई। उनमें से एक जनक महर्षि थे। पेरिय आलवर को भगवान नारायण ने यहां प्रत्यक्ष दर्शन दिए। भृगु और सौनका महर्षि को भी भगवान साक्षात हुए। लक्ष्मी मदुर वल्ली को वगुलवल्ली, वरगुण वल्ली और मर्गदवल्ली भी कहा जाता हैं।

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