यहां मृत्यु का मनाते हैं उत्सव, खुद भोलेनाथ ने दिया था मोक्ष का वरदान

miracles of lord shiva in real life

(miracles of lord shiva in manikarnika ghat varanasi)

कहते हैं पार्वती जी ने शिवजी को बांधने के लिए अपने कान की मणि (मणि कर्णिका) गिरा दी थी। भगवान को कहा, ढूंढकर लाइये। मणि नहीं मिली और भगवान वहीं रह गए मां के पास। शिव की उपस्थिति का गवाह वही मणिकर्णिका सदियों से अनवरत धधकती चिताओं में मानव देह की आहूतियां देकर मृत्यु के देवता का आह्वान कर रहा है। यही वजह है कि इस घाट पर सतत चिताग्नि धधककने के बावजूद शोक, अवसाद या रुदन की कोई किरच भी नजर नहीं आती। यहां मृत्यु एक उत्सव है, शिवत्व से साक्षात्कार का माध्यम है या फिर मुक्ति का मार्ग। वही मोक्ष, जिसका वरदान खुद भोलेनाथ ने दिया था।



संकरी और सर्पिलाकार कचौड़ी गली से मणिकर्णिका की तरफ कदम बढ़ाते हुए मन में अजीब सी धुकधुकी थी। फिल्मों, टीवी सीरियल्स और किताबों में जो वर्णन सुन, पढ़ और देख रखा था। उसकी स्मृतियां अवचेतन को डस रही थी। घाट के ठीक पहले एक बोर्ड नजर आया। आईकानिक प्लेस मर्णिकर्णिका घाट। दो कदम ही बढ़ाए थे कि चिता का तेज धुआं फेफड़ों में भर गया। एक बारगी मुंह हिलाकर फूलते नथुनों को थोड़ी राहत देने की कोशिश की, लेकिन अचानक कुछ ही क्षण में सबकुछ सामान्य हो गया। कदम आगे बढ़े तो धुएं ने अपना रास्ता बदल लिया, अब वह तंग नहीं कर रहा था।

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चार कदम बाद लकड़ी की बड़ी-बड़ी टाल से सामना हुआ। जहां नजर पड़े वहां लकड़ी के गट्ठर जमे नजर आ रहे थे। पहला झटका उन टाल से ही बाहर आया। चिता का सामान बेचने वाले, अपने आप में खोए हुए थे। कुछ उन्हीं के बीच बैठकर खाना खा रहे थे और इस दौरान आने वाले लोगों से चिता में लगने वाली लकडिय़ों की मात्रा पर बात भी करते जा रहे थे। कोई पसीने से बेहाल हो बाहर बैठा मोबाइल पर गाने सुन रहा था। अंतिम पड़ाव का यह दृश्य असामान्य सा था, क्योंकि यहां सबकुछ सामान्य था। जो मृत्यु बाकी लोगों को असहज कर देती है, इनके लिए वह दिनचर्या का एक छोटा सा भाग।

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खैर आगे घाट कुछ चौड़ा हुआ, दाएं हाथ की तरफ नीचे को सीढिय़ां जा रही थी। सामने ही एक चिता से खूब सारा धुआं उठ रहा था। आधे से अधिक भस्मिभूत हो चुका था इसलिए बाल्टियों से पानी डालकर चिता बुझाई जा रही थी, ताकि अवशेष गंगा में प्रवाहित कर पुण्यात्मा को मोक्ष के द्वार तक पहुंचाया जा सके। उसके आगे तीन-चार, पांच, छह, सात घाट पर और कोई तीन ऊपर छत की तरफ चिताएं जल रही थीं। सिर मुंडाए लोग सफेद कपड़े पहने खड़े हुए थे। कुछ लोग लाठियां लेकर चिताओं को ऊपर-नीचे कर रहे थे। जैसे अंगारे में बाटियां सेंकी जा रही हों।


घाट पर यहां-वहां अर्थियों के अवशेष, फूल मालाएं, पार्थिव देह से हटाए गए कपड़े, मटकी के टूटे- फूटे हिस्से बिखरे पड़े थे। बारिश के कारण बढ़ आई गंगा के किनारों पर खड़ी नावों में भी टनों लकडिय़ां लदी हुई थीं। पूरी तरह तैयार कि जैसे ही कोई देह पहुंचे वे जुट जाएं उसे अंतिम विदाई देने को। बादलों से घिरा आसमान भी पूरी तरह स्याह नजर आ रहा था। न तारे न चंद्रमा सिर्फ सिर के ऊपर एक घनीभूत उपस्थिति। जो संभवत: धुएं में तब्दील आत्माओं के जमघट की तरह प्रतीत हो रहा था। दारुण दृश्य जहां दूर-दूर तक सिर्फ और सिर्फ अंत ही पसरा हुआ था।

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लेकिन फिर भी वहां रुदन का कतरा नहीं था। किसी आंख में नमी नहीं थी। घाट के ऊपरी हिस्से में कोई बेसूध सोया हुआ था। पास की सीढिय़ों पर कोई सुस्ता रहा था। शव के साथ आए लोग यहां बैठे पान-बीड़ी कर रहे थे। तारकेश्वर महादेव मंदिर के आसपास दोपहिया वाहनों की कतार लगी हुई थी। और पास ही में कहीं शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम चल रहा था। कलाकार के आलाप में अनूठा आकर्षण था। लोग दाद दे रहे थे और वह अपने रियाज का कौशल दिखा रहा था। शायद 10 मिनट का एकाध हिस्सा ही ऐसा बीता होगा जब कोई नई देह वहां नहीं आई हो। राम नाम सत्य करते लोग आते और फिर घाट पर खो जाते।

समझना मुश्किल है कि क्या घाट इन चिताओं का इतना अभ्यस्त हो चुका है कि अब उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन क्या वजह है जो देह लेकर आ रहे परिजन भी नि:स्पृह महसूस होते हैं। क्या शिव के वरदान पर भरोसा उन्हें इतना साहस देता है कि वे इसे मृत्यु नहीं बल्कि मोक्ष का मार्ग समझते हैं। मृत्यु के देवता को देह की आहूति समर्पित करते हैं और किसी के मुक्ति के मार्ग का माध्यम बनने का गर्व महसूस कर उसी सहजता से अपने दैनिक जीवन में लौट जाते हैं।

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मणिकर्णिका यही सबक देना चाहता है कि संसार में लगातार चिताएं जल रही हैं। किसी से धुआं निकल रहा है तो किसी में आग धधक रही है। एक जल रहा है दूसरा जलने के लिए आ रहा है, लेकिन बाकी सब इस आवागमन के साक्षी मात्र हैं। दर्शक हैं, उतने ही शामिल, जितना उनकी भूमिका इजाजत देती है। उससे लेश मात्र भी अधिक नहीं। इसलिए ही वे मृत्यु के तट पर चैन की नींद ले पा रहे हैं, शास्त्रीय संगीत के सुरों में बह रहे हैं, गंगा के साथ प्रवाहित हो रहे हैं। मृत्यु का उत्सव मना पा रहे हैं।

(यह लेख पत्रिका इंदौर के संपादक श्री अमित मंडलोई के फेसबुक वॉल से साभार)

 

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