भगवान राम की माता कौशल्या का इकलौता मंदिर, मां की गोद में दर्शन देते हैं रामलला

chandrakhuri bhagwan ram ki maa ka mandir

रायपुर. भगवान राम की माता कौशल्या का देश का इकलौता मंदिर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर नजदीक चंद्रखुरी में हैं। यह मंदिर बेहद दुर्लभतम मंदिर माना जाता हैं, यहां भगवान राम मां की गोद में बेठे हुए स्वरुप में दर्शन देते हैं। गर्भगृह में मां कौशल्या के गोद में बालरुप में भगवान श्रीरामजी की वात्सल्यम प्रतिमा श्रद्धालुओं एवं भक्तों का मन मोह लेती है। चंद्रखुरी माता कौशल्या की जन्मस्थली हैं, यह मंदिर करीब 126 तालाबों से घिरे जलसेन तालाब के बीच बने प्राचीन द्वीप पर बना हुआ हैं।



भक्त मंदिर परिसर में सीताफल पेड़ पर पर्ची में नाम लिखकर उसे श्रीफल के साथ बांध जाते हैं। मान्यता हैं कि ऐसा करने से मांगी गई मन्नत पूरी होती हैं। असल में सीताफल का पेड़ जिस जगह है, वहां पहले नागराज की बड़ी बाम्बी हुआ करती थी और कहा जाता हैं कि यहां मांगी मन्नत नागराज पूर्ण करते हैं।

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माता की जन्मस्थली होने से ननिहाल होने की पुष्टि

छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम कोसल था। रामायण काल में छत्तीसगढ़ का अधिकांश भाग दण्डकारण्य क्षेत्र के अंतर्गत आता था। यह क्षेत्र उन दिनों दक्षिणापथ भी कहलाता था। यह रामवनगमन पथ के अंतर्गत होने के कारण श्री रामचंद्र जी के यहां वनवास काल में आने की जनश्रुति मिलती है, जिनमें उनकी माता की जन्मस्थली होने के कारण उनका इस क्षेत्र में आगमन ननिहाल होने की पुष्टि करती है। चंद्रखुरी स्थित माता कौशल्या मंदिर का जिर्णोद्धार 1973 में किया गया था। पुरातात्विक दृष्टि से इस मंदिर के अवशेष के अवलोकन से सोमवंशी कालीन आठवीं-नौंवी शती ईस्वी की मानी जाती है।

मन मोह लेती है श्रीरामजी की वात्सल्यम प्रतिमा
यहां स्थित जलसेन तालाब के आगे कुछ दूरी पर प्राचीन शिव मंदिर चंद्रखुरी
जो इसके समकालीन स्थित है। पाषण से निर्मित इस शिव मंदिर के भग्नावशेष की कलाकृति है। इस तालाब में सेतु बनाया गया है। सेतु से जाकर इस मंदिर के
प्रांगण में संरक्षित कलाकृतियों से माता कौशल्या का यह मंदिर जलसेन
तालाब के मध्य में स्थित है, जहां तक पहुंचा जा सकता है। जलसेन तालाब
लगभग 16 एकड़ क्षेत्र में विस्तृत है, इस सुंदर तालाब के चारों और लबालब
जलराशि में तैरते हुए कमल पत्र एवं कमल पुष्प की सुंदरता इस जलाशय की
सुंदरता को बढ़ाती है।



जिससे इस मंदिर की नैसर्गिक सुंदरता एवं रमणीयता और बढ़ जाती है। प्राकृतिक सुषमा के अनेक अनुपम दृश्य इस स्थल पर दृष्टिगोचर होते है। इस मंदिर के गर्भगृह में मां कौशल्या के गोद में बालरुप में भगवान श्रीरामजी की वात्सल्यम प्रतिमा श्रद्धालुओं एवं भक्तों का मन मोह लेती है। चंद्रखुरी को सैंकड़ों साल पूर्व तक चंद्रपुरी (देवताओं की नगरी) मानी जाती थी। कालातंर में चंद्रपुरी से चंद्रखुरी हो गया।चंद्रखुरी-चंद्रपुरी का अपभ्रन्श है। जलसेन के संबंध में कहावत है कि यह इस क्षेत्र का सबसे बड़ा तालाब था। इसके चारों ओर छह कोरी अर्थात 126 तालाब होने की जनश्रुति मिलती है। किंतु अभी इस क्षेत्र में 20-26 तालाब ही शेष हैं।

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रानी कौशल्या की कोख से प्रभु राम का जन्म

बाल्मिकी रामायण के अनुसार अयोध्यापति युवराज दशरथ के अभिषेक के अवसर पर कोसल नरेश भानुमंत को अयोध्या आमांत्रित किया गया था। ततो कोशल राजा भानुतमं समुद्रधृतम अर्थात राजा दशरथ जब युवराज थे, उनके अभिषेक के समय कोसल राजा श्री भानुमन्त को भी अयोध्या आमंत्रित किया गया था।

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इसी अवसर पर युवराज द्वारा राजकुमारी भानुमति जो अपने पिता के साथ अयोध्या गयी थी, उनकी सुंदरता से मुग्ध होकर युवराज दशरथ ने भानुमंत की पुत्री से विवाह का प्रस्ताव रखा हो, तभी कालांतर में युवराज दशरथ एवं कोसल की राजकन्या भानुमति का वैवाहिक संबंध हुआ। कोसल की राजकन्या भानुमति को विवाह उपरांत कोसल राजदूहिता होने के कारण कौशल्या कहा जाने लगा। रानी कौशल्या की कोख से प्रभु राम का जन्म हुआ।

 

 

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