सिख समाज के गुरु तेग बहादुर की सच्ची कहानी, औरंगजेब ने इस्लाम न स्वीकारने पर कटवाया था सिर

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दिल्ली. सिख समुदाय में 24 नवंबर का दिन बेहद यादगार दिन है। इसी दिन सिख समाज के 9 वें गुरु तेग बहादुर ने अपना बलिदान दिया था। इतिहासकारों की मानें तो मुगल बादशाह औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर का सिर कटना था, औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर के आगे शर्त रखी थी कि उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार करना होगा। मगर गुरु तेग बहादुरजी ने ऐसा करने से मना कर दिया था। गुरु तेग बहादुरजी के इस त्याग और बलिदान के लिए उन्हें हिंद दी चादर भी कहा जाता हैं। मुगल बादशाह ने जिस स्थान पर गुरु तेग बहादुर की गर्दन कटवाई थी दिल्ली में आज उस जगह पर शीशगंज गुरुद्वारा है।



गुरु तेग बहादुर की मुगल शासक औरंगजेब से विवाद की शुरुआत कश्मीरी पंडितों के मामले में हुआ था। कश्मीरी पंडित मुगल शासन द्वारा जबरन मुसलमान बनाए जाने का विरोध कर रहे थे। यही विरोध गुरु तेग बहादुरजी ने भी किया और कश्मीरी पंडितों के साथ मुगल बादशाह औरंगजेब के खिलाफ आवाज बुलंद की। आज ही के दिन उन्होंने कश्मीरी पंडितों के धार्मिक अधिकारों को बचाने के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया था। उन्होंने अपना बलिदान देकर यह संदेश दिया था, कि सच के मार्ग में किसी के आगे नहीं झुकना चाहिए।


इतिहास में वे एक मात्र ऐसे धर्मगुरु है, जो किसी दूसरे धर्म की रक्षा के लिए बलिदान हुए। इस वजह से भी उन्हें खासतौर से याद किया जाता है। बताया जाता है कि कश्मीरी पंडितों के निवेदन पर तिलक और जनेऊ की रक्षा के लिए उन्होंने स्वयं को न्यौछावर कर दिया था।

बचपन से ही थे धार्मिक (sikh 9th guru teg bahadur childhood story in hindi)

गुरु तेग बहादुर बचपन से ही धार्मिक थे। वे अमृतसर में 1621 ईस्वी सन् में 18 अप्रैल को जन्में थे। उनके पिता छठवें गुरु हरगोविंद साहिब एवं माता नानकी थीं।

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रगों में थी वीरता की निशानी (sikh 9th guru teg bahadur story in hindi)

उनकी एक-एक रगों में वीरता की निशानी दिखाई पड़ती थी। बचपन से ही वे वीर के रूप में पेश आए थे। महज 13 साल की उम्र में करतारपुर के युद्ध में वीरता का प्रदर्शन कर सभी को चौंका दिया था। यही नहीं 21 साल की उम्र में गुरु गद्दी पर बैठे थे।

और महान बना गए सिख धर्म को (sikh dharma guru name in hindi)

गुरुजी स्वयं अपना बलिदान करने के बाद देश और दुनिया ही नहीं सभी धर्मों के साामने सिख धर्म को महान बना गए। उन्होंने वीरता का संदेश देकर पूरी दुनिया को यह बताया था कि जब भी जरूरत पड़े तब किसी के भी बगैर अपना मतलब या हित देखे कुर्बान हो जाओ।



इसी वजह से आज भी सिख समाज के लोग दूसरों की मदद करने के लिए जरा भी नहीं हिचकिचाते हैं। गुरुजी के इस महान कार्य को दुनिया के सभी धर्मों में सराहना मिली है।

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