शीतला अष्टमी 2018: निरोगी शरीर की कामना के लिए करें शीतला अष्टमी व्रत

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पँ कपिल शर्मा काशी
– बसौड़ा पर्व पर न जलाएं घर में चूल्हा
गुरुवार दि॰ 08.03.18 को चैत्र कृष्ण सप्तमी पर बसौड़ा पर्व मनाया जाएगा। इसे शीतला सप्तमी भी कहते हैं। बसौड़ा का अर्थ है बासी भोजन। स्कन्द पुराण के शीतलाष्टक में महादेव ने देवी शीतला की महिमा गान किया है।
 शब्द शीतला का अर्थ है ठंडक। देवी शीतला का वास वट वृक्ष में माना जाता है, अतः इस दिन वट पूजन भी किया जाता है। शीतला स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। सभी शीतल वस्तुओं पर इनका आधिपत्य है।
पौराणिक मान्यतानुसार चतुर्भुजी देवी शीतला के एक हाथ में झाड़ू, दूसरे में कलश, तीसरे में वर मुद्रा व चौथा हाथ अभय मुद्रा में है। पीत-हरित वस्त्र धारिणी देवी की सवारी गधा है। झाड़ू सफाई का व कलश जल का प्रतीक है, झाड़ू से अलक्ष्मी व दरिद्रता दूर होती है व कलश में धन कुबेर का वास होता है। शीतला अग्नि तत्व से विरोधाभास रखती हैं, अतः इस दिन भोजन बनाने उपरांत घर में चूल्हा नहीं जलते व घर में ताजा भोजन नहीं बनाते। एक दिन पूर्व भोजन बनाकर रख देते हैं, फिर दूसरे दिन अष्टमी पर शीतला पूजन उपरांत सभी व्यक्ति बासी भोजन खाते हैं। मात्र यही एक ऐसा व्रत ही जिसमें बासी भोजन चढ़ाया व खाया जाता है। ये ऋतु का अंतिम दिन होता है जब बासी खाना खाते हैं।
शीतला को पथवारी भी कहते है अर्थात रास्ते के पत्थर, अतः इस दिन रास्ते के पत्थर को देवी रूप में पूजते है। यही देवी रास्ते में भक्तों को सुरक्षित रख पथभ्रष्ट होने से बचाती है। इस व्रत पूजन व उपाय से संकटों से मुक्ति मिलती है, मान-सम्मान में वृद्धि होती है, परिवार धन-धान्य से पूर्ण बनता है, प्राकृतिक विपदाओं से सुरक्षा मिलती है।



विशेष पूजन: रात्रि में दीपक जलाकर एक थाली में भात, रोटी, दही, चीनी, जल, रोली, चावल, मूंग, हल्दी, मोठ, बाजरा आदि डालकर मंदिर में चढ़ाएं। इसके साथ ही चौराहे पर जल चढ़ाकर पूजा करें। इसके बाद मोठ, बाजरा का बयाना निकाल कर उस पर रुपया रखकर किसी बूढ़ी स्त्री के चरण स्पर्श कर उन्हें भेंट करें। अगले दिन अर्थात अष्टमी पर शीतला मंदिर में बासी भोजन चढ़ाएं व शीतला देवी का जल व लस्सी से अभिषेक करें।
पूजन मंत्र: हृं श्रीं शीतलायै नमः॥
पूजन मुहूर्त: रात 20:00 से रात 21:00 तक।
आज का शुभाशुभ
आज का अभिजीत मुहूर्त: दिन 12:10 से दिन 12:56 तक।
आज का अमृत काल: रात 21:35 से रात 23:03 तक।
आज का राहु काल: दिन 13:59 से दिन 15:25 तक।
आज का गुलिक काल: प्रातः 09:41 से प्रातः 11:07 तक।
आज का यमगंड काल: प्रातः 06:50 से प्रातः 08:16 तक।
यात्रा मुहूर्त: आज दिशाशूल दक्षिण व राहुकाल वास दक्षिण में है। अतः दक्षिण दिशा की यात्रा टाल
आज का  कलर: पीत।
आज का दिशा: ईशान।
आज का  मंत्र: श्रीं शीतलायै शान्तिप्रदायै नमः॥
  टाइम: प्रातः 11:10 से प्रातः 12:10 तक।
संकटों से मुक्ति हेतु मीठे दूध में अपनी छाया देखकर बरगद पर चढ़ाएं।
मान-सम्मान में वृद्धि हेतु रात्रि में गौघृत का अष्टमुखी दीपक चौराहे पर जलाएं।
प्राकृतिक विपदाओं से सुरक्षा हेतु देवी शीतला पर खट्टे दही
अगर सफलता पानी हो तो धैर्य जरूर होना चाहिए। यही हमें बतलाती हैं मां शीतला। सृष्टि में सबसे ज्यादा धैर्यवान गधा इनका वाहन है, जिसे गणेश जी की सर्वाधिक प्रिय दूब बहुत पसंद है। माता शीतला सात बहन हैं- ऋणिका, घृर्णिका, महला, मंगला, शीतला, सेठला और दुर्गा। चैत्र कृष्ण अष्टमी से आषाढ़ कृष्ण अष्टमी तक होने वाले 90 दिन के व्रत को ही गौरी शीतला व्रत भी कहा जाता है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ के कृष्ण पक्ष की अष्टमी शीतला देवी की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित होती है। इन महीनों में गर्मी शुरू होने लगती है। चेचक आदि की आशंका रहती है। प्रकृति के अनुसार शरीर निरोगी हो, इसलिए भी शीतला अष्टमी व्रत किया जाता है
शीतल जल में स्नान करके-



 ‘मम गेहे शीतलारोग जनितोपद्रव प्रशमनपूर्वकायुरोग्यैश्वर्याभिवृद्धये शीतलाष्टमी व्रत करिष्ये’ मंत्र का संकल्प व्रती को करना चाहिए।
नैवेद्य में पिछले दिन के बने शीतल पदार्थ- मेवे, मिठाई, पूआ, पूरी, दाल-भात, लपसी और रोटी-तरकारी आदि कच्ची-पक्की आदि चीजें मां को चढ़ानी चाहिए। रात में जागरण और दीये अवश्य जलाने चाहिए।नाभिकमल और हृदयस्थल के बीच विराजमान शीतला देवी अपने वाहन गर्दभ (गधे) पर सवार रहती हैं। स्कन्द पुराण में शीतलाष्टक स्तोत्र है। मान्यता है कि उसकी रचना भगवान शंकर ने की थी।
‘वन्देùहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम।
मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालंकृतमस्तकाम॥’
माता शीतला की आराधना और शीतलाष्टक
माता शीतला का धर्म शास्त्रों में विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि शीतला माता की पूजा आराधना करने से न केवल रोगों का नाश हो जाता है तो वहीं सामान्य पूजा अर्चना से ही माता शीतला अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर मनोकामना पूरी कर देती है। माता शीतला की सामान्य आराधना के साथ ही शीतलाष्टक का पाठ भी नित्य करना चाहिए, इस पाठ का मूल यहां दिया जा रहा है।
शीतलाष्टक-स्तोत्र –
।।ईश्वर उवाच।।
वन्देऽहं शीतलां-देवीं, रासभस्थां दिगम्बराम्।
मार्जनी-कलशोपेतां, शूर्पालङ्कृत-मस्तकाम् ।।१।।
वन्देऽहं शीतलां-देवीं, सर्व-रोग-भयापहाम्।
यामासाद्य निवर्तन्ते, विस्फोटक-भयं महत् ।।२।।
शीतले शीतले चेति, यो ब्रूयाद् दाह-पीडितः।
विस्फोटक-भयं घोरं, क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति ।।३।।
यस्त्वामुदक-मध्ये तु, ध्यात्वा पूजयते नरः।
विस्फोटक-भयं घोरं, गृहे तस्य न जायते ।।४।।
शीतले ! ज्वर-दग्धस्य पूति-गन्ध-युतस्य च।
प्रणष्ट-चक्षुषां पुंसां , त्वामाहुः जीवनौषधम् ।।५।।
शीतले ! तनुजान् रोगान्, नृणां हरसि दुस्त्यजान् ।
विस्फोटक-विदीर्णानां, त्वमेकाऽमृत-वर्षिणी ।।६।।
गल-गण्ड-ग्रहा-रोगा, ये चान्ये दारुणा नृणाम्।
त्वदनुध्यान-मात्रेण, शीतले! यान्ति सङ्क्षयम् ।।७।।
न मन्त्रो नौषधं तस्य, पाप-रोगस्य विद्यते।
त्वामेकां शीतले! धात्री, नान्यां पश्यामि देवताम् ।।८।।
अर्थात गर्दभ पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाड़ तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तक वाली भगवती शीतला की मैं वंदना करता हूं। ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में झाड़ होने का अर्थ है कि माता को वे लोग ही पसंद हैं, जो सफाई के प्रति जागरूक रहते हैं। कलश में भरे जल से हमारा तात्पर्य है कि स्वच्छ रहने से ही सेहत अच्छी होती है।



इस व्रत को करने से शीतला देवी प्रसन्न होती हैं। इससे परिवार में दाहज्वर, पीतज्वर, पीड़ा, नेत्रों के समस्त रोग तथा शीतलाजनित दोष समाप्त होते हैं। उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में सिराथू के पास स्थित कड़ा धाम शीतला माता का बुहत प्रसिद्ध तीर्थ है। उत्तराखंड के काठगोदाम, हरियाणा के गुरुग्राम और गुजरात के पोरबंदर में भी शीतला माता के भव्य मंदिर हैं। गौरतलब है कि गुप्त मनौती माता को बताते वक्त भक्तगण इस मंत्र का बराबर जाप करते रहते हैं-
 ‘शीतला: तू जगतमाता, शीतला: तू जगतपिता, शीतला: तू जगदात्री, शीतला: नमो नम :
शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत पिता
शीतले त्वं जगतधात्री शितलायै नमो नम:
जय माँ शीतला ….

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