ग्रह कर रहे हैं फेरबदल, शनि प्रदोष व्रत की यह कथा पढ़ने से ही मिल जाएगा पूजन का पुण्य

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आज शनिवार को ग्रह बदल रहे हैं। इस काल में एक पूजा आपके लिए काफी फलदायी होगी, इस पूजन से असंभव भी संभव बन जाएगा और शुभ परिणाम देगा। शनिवार दिनांक 19.08.17 को भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी तिथि प्रातः 07:17 से प्रारंभ होगी। इस बार का शनि प्रदोष स्वयं सिद्ध विशेष होगा। क्योंकि इस दिन सूर्यास्त से पहले चंद्रमा अपनी राशि परिवर्तन करके स्वयं की राशि कर्क में आ जाएगा व पुष्य नक्षत्र में शाम 19:10 बजे प्रवेश करेगा। इस दिन सूर्यास्त का समय शाम 18:52 पर है। इसी कारण शनि-पुष्य प्रदोष योग में यह त्रियोदशी अति विशेष है।



इस दिन गौ के समान शुद्ध और पवित्र वाणिज नामक करण रहेगा जो निश्चित सफलता का सूचक है। इस दिन प्रदोष काल शाम सूर्यास्त के बाद 18:52 से लेकर रात 21:11 तक रहेगा परंतु श्रेष्ठ महूर्त शाम 19:09 से लेकर रात 20:11 तक रहेगा। इस काल में शिवलिंग का विशिष्ट पूजन असंभव को भी संभव बना सकता है।

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शनि प्रदोष व्रत कथा

स्कंद पुराण के अनुसार प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती और संध्या को लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक दिखाई दिया जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था। उसकी माता की मृत्यु भी अकाल हुई थी। ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया।

कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई। वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भदेश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता को ग्राह ने अपना भोजन बना लिया था। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू किया।

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एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आई। ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार धर्मगुप्त “अंशुमती” नाम की गंधर्व कन्या से बात करने लगे। गंधर्व कन्या और राजकुमार एक दूसरे पर मोहित हो गए, कन्या ने विवाह करने के लिए राजकुमार को अपने पिता से मिलवाने के लिए बुलाया।



दूसरे दिन जब वह दुबारा गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता ने बताया कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है। भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कराया।

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इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व सेना की सहायता से विदर्भ देश पर पुनः आधिपत्य प्राप्त किया। यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के प्रदोष व्रत करने का फल था। स्कंदपुराण के अनुसार जो भक्त प्रदोषव्रत के दिन शिवपूजा के बाद एक्राग होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती।

ऐसे करें विशेष पूजन
शनि प्रदोष के दिन प्रात:काल स्नानादि के पश्चात बिल्वपत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप आदि षोडशउपचार से शिव आराधना करें। सूर्यास्त के पश्चात संध्याकाल में ही पुन: शिवलिंग की पूजा करें। लाल कंबल के आसान पर उत्तरमुखी होकर बैठ जाएं उड़द के आटे से बना तिल के तेल का 13 मुखी दीपक जलाएं, लोहबान से धूप करें, काजल अर्पित करें, भस्म चढ़ाएं, सिंदूर अर्पित करें, लौंग अर्पित करें, साबुत काली मिर्च चढ़ाएं, नीले और लाल फूल चढ़ाएं तथा एक जटा युक्त नारियल शरीर से वारकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। इसके बाद सातमुखी रुद्राक्ष आभाव में काले हकीक की माला से इस मंत्र का 13 माला जाप करें। जाप के पश्चात शिवलिंग पर चढ़ी पूरी सामाग्री किसी गरीब अथवा डाकोत को दान दें अथवा शनि मंदिर में छोड़ दें।

विशिष्ट मंत्र: क्लीं कामफलप्रदाय नमः शिवाय क्लीं॥

 

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