दीर्घत्तम अध्यात्मः पल के १००वें हिस्से में भी आपका अंतःकरण शुद्ध है तो साक्षात भगवान चले आते हैं

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परमहंस संत श्रीराम बाबाजी महाराजजी। बिलासपुर स्थित निवास पर पधारे।जीवन को समर्पण भाव से भर लें तो वास्तव में चीजें आसान होती चली जाती हैं। यह बात श्री राम बाबाजी की दर्शन के बाद और बेहतर ढंग से समझ में आती जा रही है। बीते दिन महाराजी श्री रामबाबाजी का बिलासपुर आगमन हुआ। यह जीवन की एक ऐसी घटना थी, जिसने कइयों बार मन में आनंद को पसो भर-भरकर खुद के भीतर छिड़का। आध्यात्मिक आनंद, अनुभूतियां और समर्पण भाव के मिश्रण से समस्त सांसारिक वर्जनाओं, गर्जनाओं और गतिरोधों का विरेचन करने वाले श्री रामबाबाजी के दर्शन से ही हम अनंत आनंद की अनुभूति करते हैं।
आगमन से पहले की कहानी लाख इच्छा, कोटि प्रतीक्षा और शतकोटि प्रयास एक पल के शुद्ध अंतःकरण से कहीं कम हैं…
महाराज जी के बिलासपुर आगमन की अभिलाषा यूं तो नई नहीं थी। इससे पहले जब मैं रायपुर रहा करता था, तब भी मैं और पत्नी शिवांगी श्रीवास्तव अभीष्ट इच्छा रखते थे कि महाराजजी पधारें जरूर। उनकी जीवनशैली और भगवत्चिंतन शैली अद्भुत है। रायपुर में तो ये सौभाग्य नहीं मिल पाया, मगर बिलासपुर में जरूर मिल गया। लेकिन इसमें समझने की बात ये है कि लाख इच्छा, कोटि प्रतीक्षा, शतकोटि प्रयास और एक पल के १००वें भाग में अंतःकरण की पूर्ण शुद्धता उपरोक्त तीनों पर भारी पड़ती है। मेरे साथ आगे जो आप पढ़ेंगे वह आपको महाराजजी की अनंत लीलाओं का प्रत्यक्ष दर्शन करवाएगा।
न कोई ठिकाना न संपर्क
महाराजजी समस्त शोकों का शमन करने वाले हैं। अंतःमन में अनंत भाव रखिए। समर्पण रखिए। महाराजजी जरूर आएंगे। यह इच्छा बलवती होती गई। एक बार मई में ऐसा भाग्य जुड़ा तो एक छोटी से चूक ने उनकी यात्रा टाल दी। इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है कि आपके अंतरभाव में जरा भी ऊंच-नीच हुई, महाराजजी मुंह के सामने से लौट जाते हैं। इस दिव्य अनुभूति का आनंद भी असीम होता है। मई महीने में जब महाराज जी का आगम होने की सूचना मिली तो मैं दुर्भाग्य से उस समय विदिशा में था। महाराजजी ने पूछा कब पहुंचेंगे, यथा योजना मैंने बताया १२ मई को बिलासपुर में होंगे। महाराजजी से संपर्क अत्यंत कठिन होता है। चूंकि वे न तो कोई मोबाइल रखते हैं न किसी एक ठिकाने पर मिलते हैं। हां, उदयपुरा नगर सौभाग्यशाली है कि वहां वे समयांतराल में आते-जाते जरूर हैं। यहां पर पंचमुखी हनुमान मंदिर महाराजजी ने ही बनवाया है। वे वहां आते हैं, लेकिन यह जरूरी भी नहीं है। वे अक्सर कहा करते हैं कि यह चौकी है थाना नगर का तलापुरा हनुमान मंदिर है।
सिर्फ इच्छा नहीं, भाव चाहिए
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      महाराजजी के आगमन की अभिलाषा भर से काम नहीं चलता। भाव होना जरूरी है। जब महाराजजी के आने की संभावना बढ़ी तो मेरा संसारी दिमाग इन सब चीजों में ज्यादा खर्च होने लगा कि महाराजजी आएंगे तो क्या व्यवस्था ऐसी की जाए कि उन्हें कोई दिक्कत न हो। वे आनंदपूर्वक रहें और हम उनकी अधिकतम सेवा कर पाएं। जबकि महाराजजी को तैयारियां नहीं भाव चाहिए। वो समर्पण भाव यानी जिसमें किसी तैयारी की जरूरत नहीं होती। चूंकि मेरे दिमाग में कार्यलयीन संबंधी उठा-पटक कैसे करूंगा के बारे में भी प्लानिंग चल रही थी। यद्यपि मन में प्रतिबद्धता थी कि कार्यालय गतिरोध नहीं बनेगा।
जेहन में जेब का ख्याल नहीं जीवन का लाइए
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      तब महाराजजी से संपर्क नहीं हो पाया। जब हम बिलासपुर आ गए तो महाराजजी ने डिंडोरी के भक्त झारियाजी के नंबर से बात की। महाराजजी ने हल्के स्वर में कहा कि डिंडोरी आ सकते हो क्या?. मैं दुर्भाग्यशाली था तो तुरंत निकला महाराजजी यहां से डिंडोरी के लिए कोई सीधा साधन नहीं है। यह बात थी तो सच, मगर बाद में मुझे मलाल अत्यधिक हुआ कि क्यों नहीं महाराजजी से मैंने कहा कि जी हां मैं आरहा हूं। चूंकि मेरे पास कार नहीं है। बाइक से डिंडोरी जाना फिर महाराजजी को यहां लाना अव्यवहारिक था। मुझे यह करना चाहिए था कि जी महाराजजी मैं आ रहा हूं और किराए की गाड़ी लेकर पहुंच जाता, लेकिन इसमें मेरे जेहन में जेब का ख्याल बड़ा हो गया। शायद मौजूदा आर्थिक आंकड़ों के हिसाब से यह अफोर्ड नहीं भी कर पाता, शेष तो महाराजजी की कृपा थी।
अहंकार, चोरी छिपे घुसता है इसपर कड़ी नजर रखिए
     अब अगला संयोग गुरुपूर्णिमा के दिन बना। महाराजजी ने कहा आ सकते हैं। मैं और मेरी पत्नी अति प्रसन्न। तैयारियां जोरों पर, फिर एक विचार मन में आया। गुरुपूर्णिमा पर महाराजजी यहां आएंगे, ये तो महासौभाग्य होगा। एक अहंकार ने जन्म लिया। देखो सालों से जुड़े भक्तों के रेले को छोड़कर महाराजजी यहां आ रहे हैं, वो भी गुरुपूर्णिमा पर। यह अहंकार भाव अनजाने ही बैठ गया। यह इतने चुपके से आया कि मुझे पता ही नहीं चला। परंतु दिव्यदृष्टा श्री रामबाबाजी को ऐसा लग गया। बस क्या था महाराजजी का कार्यक्रम रद्द हो गया। इसकी सूचना हमें देर रात ८ बजे मिली। महाराजजी के दर्शन, अवसाद से नहीं भाव और सिर्फ भाव से होते हैं
      अब हम अपनी ओर से आश छोड़ने लगे थे। मगर एक दिन एक पल के सौवें हिस्से में महाराजजी को मैंने स्मरण किया। मेरी पत्नी लगातार इस बीच कहती, न जाने महाराजजी कब आएंगे। मैंने जब स्मरण किया तब मैं और मेरी पत्नी दोनों ही महाराजजी के संभावित आगमन पर बेआश, निराश बातें कर रहे थे। एक पल मुझे ऐसी अनुभूति हुई कि साक्षात हनुमानजी हैं और मैं उनके सामने खड़ा हूं। पूरा पवित्र, शुद्ध, समर्पित तथा पारदर्शी बनकर। न मन में कोई अन्य सोच न कोई ऊहोपोह, न असमंजस, न दुविधा। पूर्ण पारदर्शी। कोई योजना नहीं। कोई विचार नहीं। कोई क्रिया नहीं। कोई कर्म नहीं। कोई भी किसी भी तरह का फर्क नहीं अंदर और बाहर में। यह शुद्धता, पारदर्शिता एक सेकंड के १००वें हिस्से में रही होगी। मन आनंद से प्रफुल्लित हो गया। ऐसा लगा जैसे अब कामना पूर्ण होने को है।
      इसी अनुभूति के चंद मिनटों में उदयपुरा से श्री राजेंद्र लोधी जी का फोन आया। उन्होंने सूचना दी कि महाराजजी उदयपुरा स्थित उनके घर पर आए हैं और बिलासपुर चलने को कह रहे हैं। यह सुनकर मैं और मेरी पत्नी उत्साहित हो गए। श्री रामबाबाजी महाराजजी का आगमन बहुतप्रतिक्षित था। इसलिए अविरल आनंद स्वभाविक था। मुझे इस बात का पूर्ण विश्वास हो गया कि बिनु हरि कृपा मिलहीं नहीं संता….। साथ ही यह विचार बलवती हुआ कि हमारा अंतस सेकंड यानी पल के १००वें हिस्से में भी अगर पूर्ण पारदर्शी हो जाता है तो हमें हरिदर्शन और कृपा दोनों मिल जाती हैं।
      शुद्ध अंतःकरण ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। छल, कपट, दंभ, द्वेष और पाखंड का दमन कर देनेभर से भी काम नहीं चलता, जब तक कि हम भीतर-बाहर उज्जवल न हों। लंबी प्रतीक्षा के बाद महाराजजी बिलासपुर स्थित हमारे घर आए। उनके आगमन पर अगली किस्त में…।
@सखाजी

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