फिल्म: जो आपके ही पुरखों के अपमान की गाथा आपकी ही जेब से पैसा वसूलकर आपको दिखाती है!

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आखिर संजय खिलजी भंसाली ने मध्य प्रदेश का किला भेद ही दिया, मध्य प्रदेश में भी दबे—छुपे रास्ते से ‘पद्मावत’ आ ही गई!
मध्य प्रदेश, राजस्थान सहित कुल चार राज्य हैं, जिन्होंने अब तक संजय खिलजी भंसाली की कूटरचित फिल्म ‘पद्मावत’ को प्रतिबंधित कर रखा है। सुप्रीम कोर्ट के तोप—गोलों ने पहले ही अन्य राज्यों के किलों की दीवारों में छेद कर दिए थे और आज रात मार्केटिंग के चालाक, शातिर रणनीतिकारों ने आखिरकार मध्य प्रदेश के किले में भी सेंध लगा ही दी।
अभी—अभी मैं ​इंदौर में की गई पद्मावत फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग से लौटा हूं। विजयनगर क्षेत्र के मंगल सिटी मॉल में रात 9 से 12 का कथित ‘विशेष शो’ रखा गया, जिसमें करणी सेना सहित अन्य हिंदू—राजपूत संगठनों और मीडिया के चुनिंदा लोगों को बुलाकर फिल्म दिखाई गई। फिल्म क्या दिखाई, सहमति बनाने का प्रयास किया गया। भंसाली और फिल्म वितरकों की टपकती लार आखिरकार यहां भी कामयाब होती दिख रही है क्योंकि जो ‘राजपूत’​ फिल्म देखने आए थे, उनमें से कई फिल्म देखने के बाद सिनेमैटोग्राफी, भव्य दृश्य, गजब की जंग और कॉस्ट्यूम की तारीफ करते रंगे—मुंह पकडे गए।



हद है अपने ही इतिहास के प्रति इतना छिछला गौरव—बोध रखने की। जिस महारानी पद्मावती का गौरव आपके रक्त में दौडता है, उसका अपमान देखने के बावजूद आप फिल्म की कॉस्ट्यूम, सिनेमैटोग्राफी और दृश्यों की भव्यता जैसी चीजों पर बात कर रहे हैं। डूब मरना चाहिए आपको यह सब कहने के पहले।



मैंने अब तक फिल्म पर कुछ नहीं लिखा—कहा था, मगर अब देखकर आया हूं इसलिए कहता हूं कि इस फिल्म को कतई नहीं रिलीज होने देना चाहिए था। जब संजय खिलजी भंसाली को 100—50 करोड का फटका लगता और सिर्फ ‘मनोरंजन और पैसा बनाने के उद्देश्य से’ उसका राजपूती और हिंदू गौरव को पददलित करने का मसूंबा गर्भ में ही मारा जाता, तो अगली बार बॉलीवुड का कोई भांड इतिहास को कलंकित स्वरूप में पेश करने की हिम्मत न करता।
थियेटर एसोसिएशन, फिल्म की मार्केटिंग के लोग जानते हैं कि मध्य प्रदेश में इंदौर को जीत लिया, यानी पूरा प्रदेश ​जीत लिया। क्योंकि इंदौर से यदि फिल्म पर सहमति के सुर निकले तो फिर और किसी शहर में विरोध नहीं ही होगा। दरअसल, ये उनकी कूटनीति है और इसमें वे काफी हद तक सफल भी दिखे। फिल्म देखकर निकले राजपूत और हिंदू संगठनों के साथी इतिहास के सही ज्ञान के अभाव में ही—ही करते बाहर आए और मीडिया को बयान भी दिए तो उसी सदाशयता के साथ, जिसके कारण आज तक वे हारते गए।



यदि कोई आपके मुंह पर थूके तो आप उसका गाल बजा देंगे, लेकिन यदि कोई आपके मुंह पर दूध का कुल्ला करे तो क्या आप उसे ‘थूक का श्रेष्ठ’ स्वरूप कहकर स्वीकार कर लेंगे? इंदौर में की गई पद्मावत फिल्म की ‘विशेष स्क्रीनिंग’ मध्य प्रदेश में फिल्म का विरोध कर रहे लोगों के मुंह पर मानो ‘दूध का कुल्ला’ ही है। जिसे कई लोगों ने हंसी—खुशी स्वीकार कर लिया है। मुझे परदे के पीछे संजय खिलजी भंसाली अट्टहास करता सुनाई दे रहा है।

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जबकि ये है फिल्म की सच्चाई

— पूरी फिल्म खिलजी के महिमामंडन की गाथा है, और भंसाली की भव्यता ने उसे दुर्दांत हत्यारे आक्रांता को ऐसे खलनायक की तरह पेश किया है कि पूरी फिल्म में नायक तो वह लगता है!



— शुरू से अंत तक मुस्लिम आक्रांताओं का आक्रमण और हिंदू—राजपूतों को बचाव या मूर्खतापूर्ण से ढंग से मर—खप जाने की मुद्रा में दिखाया गया है।
— ​फिल्म में पात्र चयन ही सारा षड्यंत्र बयां कर देता है। कमजोर—सा शाहिद राजा रतन रावल सिंह बना है और ताकतवर रणबीर कपूर हिंसक खिलजी बनकर हर हिस्से पर छाया हुआ है।
— चित्तौड के धर्मगुरु चेतन ब्राह्मणों का प्रतीक है और उसे ऐसा लंपट, दुष्ट और घाट बनाकर पेश किया गया है कि राजपूतों और ब्राह्मणों के बीच दुराव हो जाए।



फिल्म देखकर लौटा मैं व्यथित हूं कि हाय ये हिंदू इतना सदाशय और सीधा—सरल क्यों है कि अपनी ही हार को थियेटर में किसी जश्न की तरह देखता और ताली बजाता है। वो मूढमति समझता भी नहीं कि यह उसके पूर्वजों के अपमान की कहानी है और वह उसे पॉपकॉर्न चगलते हुए कोल्ड ड्रिंक के साथ बडे आराम से गटक जा रहा है।
(-पत्रकार ईश्वर शर्मा जी द्वारा लिखी गई महत्वपूर्ण जानकारी। )

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