मां महामाया देवी मंदिर में की विधि विधान से नाग देवता की यह पूजा

nag panchami festival at shree raj rajeshwari maa mahamaya devi mandir raipur

गुरुवार को महामाया मन्दिर में नागपंचमी पूजन मनाया गया ।  सुबह 9 बजे महामाया मन्दिर परिसर के पीछे बाडी में किये गये इस पूजन में मन्दिर के पुजारी गण पंडित श्रीकांत पाण्डेय , पंडित मनोज शुक्ला , प. लक्ष्मीकांत पाण्डेय के साथ बहुत संख्या में श्रद्धाळू दर्शनार्थी गण शामिल हुए।
विधि विधान से नाग देवता के पूजन के बाद मन्दिर परिसर में वृक्षारोपण भी किया गया जिसमें आम , पीपल , नीम , चंदन , शमी , रुद्राक्ष , कदंब , गुलाब , कटहल , जामून , कनेर , हरसिंगार आदि धार्मिक पूजन के पौधे व फळ फुल वाले पौधे थे हिंदू धर्मग्रन्थों के अनुसार, श्रावण मास की शुक्ल पक्ष पंचमी को “नागपंचमी” का पर्व परम्परागत , श्रद्धा एवं विश्वास के साथ मनाया जाता है।

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यह नागों और सर्पों की पूजा का पर्व है। मनुष्य और नागों का संबंध पौराणिक कथाओं से झलकता रहा है। हिंदू धर्मग्रन्थों में नाग को देवता माना गया है और इनका विभिन्न जगहों पर उल्लेख भी किया गया है। पण्डित मनोज शुक्ला महामाया मन्दिर रायपुर बताते हैं कि हिन्दू धर्म में कालिया, शेषनाग, कद्रू (साँपों की माता) तक्षक आदि बहुत प्रसिद्ध हैं।
कथाओं के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री तथा कश्यप ऋषि (जिनके नाम से कश्यप गोत्र चला) की पत्नी ‘कद्रू’ नाग माता के रूप में आदरणीय रही हैं। कद्रू को सुरसा के नाम से भी जाना जाता है।

पौराणिक महत्ता:- शेषनाग के फन पर पृथ्वी टिकी है। भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर सोते हैं। शिवजी के गले में सर्पों का हार है। कृष्ण जन्म पर नाग की सहायता से ही वासुदेवजी ने यमुना पार की थी। यहां तक कि समुद्र-मंथन के समय देवताओं की मदद भी वासुकी नाग ने ही की थी। इसलिय नाग देवता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है- नागपंचमी।

वर्षा ऋतु में वर्षा का जल धीरे-धीरे धरती में समाकर सांपों के बिलों में भर जाता है। इसलिए श्रावण मास में सांप सुरक्षित स्थान की खोज में अपने बिल से बाहर निकलते हैं। संभवतः उस समय उनकी रक्षा करने और सर्पभय व सर्पविष से मुक्ति पाने के लिए भारतीय संस्कृति में इस दिन नाग के पूजन की परंपरा शुरू हुई।
पूरे श्रावण माह विशेष कर नागपंचमी को धरती खोदना निषिद्ध है।

नागपूजन करते समय इन 12 प्रसिद्ध नागों के नाम लिये जाते हैं- धृतराष्ट्र, कर्कोटक, अश्वतर, शंखपाल, पद्म, कम्बल, अनंत, शेष, वासुकी, पिंगल, तक्षक और कालिय। साथ ही इनसे अपने परिवार की रक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है।

मनसा देवी की पूजा:-
उत्तर भारत में नागपंचमी के दिन मनसा देवी की पूजा करने का विधान भी है। मनसा देवी को भगवान शिव की मानस पुत्री और नागराज वासुकी की बहन के रूप में पूजा जाता है। देवी मनसा को नागों की देवी माना गया है, इसलिए बंगाल, ओडिशा और अन्य क्षेत्रों में नागपंचमी के दिन मनसा देवी की पूजा-अर्चना की जाती है।

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नागपूजा या सर्पपूजा किसी न किसी रूप में विश्व में सब जगह की जाती है। दक्षिण अफ्रीका में कई जातियों में नाग कुलदेवता के रूप में पूजा जाता है। ऐसा समझा जाता है कि कुल की रक्षा का भार सर्पदेव पर है। कई जातियों ने नाग को अपना धर्मचिह्न स्वीकार किया है। ऐसा भी मान्यता है कि पूर्वज सर्प के रूप में अवतरित होते हैं।

शिव की आराधना भी नागपंचमी के पूजन से जुड़ी है। पशुओं के पालनहार होने की वजह से शिव की पूजा पशुपतिनाथ के रूप में भी की जाती है। शिव की आराधना करने वालों को पशुओं के साथ सहृदयता का बर्ताव करना जरूरी है।

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नागपंचमी के दिन क्या करें-
– इस दिन नागदेव के दर्शन अवश्य करना चाहिए।
– बांबी (नागदेव का निवास स्थान) की पूजा करना चाहिए।
– नागदेव को दूध भी पिलाना चाहिए।
– नागदेव की सुगंधित पुष्प व चंदन से ही पूजा करनी चाहिए क्योंकि नागदेव को सुगंध प्रिय है।

– ॐ कुरुकुल्ये हुं फट् स्वाहा का जाप करने से सर्प दोष दूर होता है।

ऐसे होती हैं यह खास पूजन
– सुबह उठकर घर की सफाई करके नित्यकर्म से निवृत्त हो जाएं।
– तपश्चात स्नान कर धुले हुए साफ एवं स्वच्छ कपड़े धारण करें।
– नाग पूजन के लिए सेंवई-चावल आदि ताजा भोजन बनाएं।
– कुछ भागों में नागपंचमी से एक दिन पहले ही भोजन बना कर रख लिया जाता है और नागपंचमी के दिन बासी (ठंडा) खाना खाया जाता है।
– इसके बाद दीवार पर गेरू पोतकर पूजन का स्थान बनाया जाता है। फिर कच्चे दूध में कोयला घिसकर उससे गेरू पुती दीवार पर घर जैसा बनाते हैं और उसमें अनेक नागदेवों की आकृति बनाते हैं।
– कुछ जगहों पर सोने, चांदी, काठ व मिट्टी की कलम तथा हल्दी व चंदन की स्याही से अथवा गोबर से घर के मुख्य दरवाजे के दोनों बगलों में पांच फन वाले नागदेव अंकित कर पूजते हैं।
– सर्वप्रथम नागों की बांबी में एक कटोरी दूध व लाई चढ़ा आते हैं।
– फिर दीवार पर बनाए गए नागदेवता की दही, दूर्वा, कुशा, गंध, अक्षत, पुष्प, जल, कच्चा दूध, रोली और चावल आदि से पूजन कर सेंवई व मिष्ठान से उनका भोग लगाते हैं।
– पश्चात आरती करके कथा का श्रवण किया जाना चाहिए।

 

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