मकर संक्रांति के पीछे है यह सच्ची पौराणिक कथा, जानिए मकर संक्रांति सूर्य उत्तरायण का महत्व

makar sankranti festival
मकर संक्रांति हिन्दुओ के प्रमुख त्यौहारों में से एक है इस दिन ग्रहमंडल के
राजा सूर्यदेव अपने पुत्र शनि देव की राशि मकर में प्रवेश करते है इस वर्ष यह
दिन 15 जनवरी 2018 को आ रहा है इसी दिन सूर्यदेव दक्षिणयन से उत्तरायण
हो जाते है और यहीं से फिर मांगलिक कार्यक्रमों की शुरूवात हो जाती है जो
मल मास होने के कारण या धनु राशि के सूर्य के कारण एक माह से बन्द थे।
यह पर्व संपूर्ण भारतवर्ष में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है पौष मास
में जब सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश करते है तब इस त्यौहार को मनाया जाता
है ।  यह किस तारीख को मनाया जायेगा यह इस बात पर निर्भर करता है
कि सूर्य कब धनु से मकर राशि से प्रवेश करते है। कभी 12 से लगकर 15 जनवरी
तक यह मनाने का विधान पूर्व में रहा है इस वर्ष यह दिन 15 जनवरी को
मनाया जावेगा। मकर संक्रांति के बारे में कई पौराणिक कथायें प्रचिलित है
जैसे भगवान सूर्यदेव अपने पुत्र शनिदेव से मिलने के लिये उनके घर जाते है
चूंकि मकर शनि की राशि है और सूर्य इसी राशि में प्रवेश करते है ।
एक कथा यह भी प्रचिलित है कि गंगा जी भागीरथ के पीछे पीछे चलकर
कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर मिलन इसी दिन हुआ था।
इसी दिन महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिये तर्पण भी किया था।
इसी लिये मकर संक्रांति पर गंगासागर में मेला लगता है । महाभारत में
गंगापुत्र पितामह भीष्म ने भी प्र्राण त्यागने के लिये इसी दिन का चुनाव किया
था इस दिन देह त्यागने वाले लोगो को श्रीकृष्ण के धाम में स्थान मिलता है ।
दक्षिण भारत में तमिलनाडू में इसे पोंगल तो तेलंगाना,सीमान्घ्र , कर्नाटक और
केरल में यह केवल संक्रांति के नाम से मनाया जाता है । उत्तर भारत में
पंजाब हरियाणा में लोहिड़ी तो पूर्वी भारत में असाम में बीहू के नाम से और
पूर्ण मध्यभारत में इसे मकर संक्रांति के नाम से मनाया जाता है ।
मकर संक्रांति के दिन पुण्यकाल में दान देना, स्नान करना या श्राद्ध के कार्य
करना शुभ रहता है चूकि इस दिन महाराज भागीरथ ने भी अपने पित्रों के
लिये तर्पण किया था इसिलिये तर्पण का विधान भी है चूकि सूर्योदय के समय
सूर्यदेव धनु राशि में रहेंगे प्रातः काल मकर राशि में प्रवेश करेंगे।
प्रातः काल से लेकर संपूर्ण दिन पुण्य स्नान का लाभ ले सकेंगे  इसदिन
खिचडी का भोग सूर्य देव को लगाया जाता है इसीलिये इस दिन खिचडी के
दान का विधान है तो इसी दिन तिल से स्नान का विधान भी है और तिल्ली
के तेल से पूर्ण शरीर पर मालिश करने के बाद पुण्य स्नान का विधान है ।
और परंपरा के अनुसार इस दिन तिल गुड खाया जाता है पतंग उड़ाना भी
इस दिन की परंपरा का हिस्सा है विभिन्न रंगों एवं विभिन्न आकार की पतंगो
उडाकर बच्चों के साथ बडे भी रोमांचित हो आनंद का अनुभव करते है ।
भविष्यपुराण के अनुसार इस दिन प्रयाग एवं गंगा सागर में स्नान का विशेष
महत्व है । इस दिन स्नान एवं दान से पुण्यलाभ होता है ।
15 जनवरी से 15 जुलाई तक सूर्य उत्तरायण में रहते है वंही 16 जुलाई से
14 जनवरी सूर्य देव दक्षिणायन की ओर भ्रमण करते है । चूकि पूर्व से उत्तर
की भ्रमण ईशान के रास्ते उत्तर की ओर ईशान में ईश्वर का वास होता है
अतः ईश्वर की ओर जाने वाले मोक्ष प्राप्त करते है  अथवा उन्हे देवदूत लेने
आते है तो वे स्वर्ग जाते है इसके विपरीत जब सूर्य देव  दक्षिणायन की ओर
होते है अर्थात दक्षिण की ओर जाना दक्षिण दिशा में यम का वास माना जाता
है अतः नरक के द्वार पर पंहुचते है उन्हे लेने के लिये यमदूत आते है ।
इस वर्ष संक्रांति का आगमन वाहन महिष पर हो रहा है और उपवाहन उंट होगा । विशेष में संक्रांति दक्षिण गमन वाली होंगी और दृष्टि नैऋत्य में होगी साथ ही श्याम वस्त्र में होगी । पर्व का आयुध तोमर होगा और पात्र खप्पर होगा एवं दधि भक्षण के साथ संक्राति का पर्व पूर्ण होगा । कल्पतरू ज्योतिष केन्द्र पर धर्म एवं ज्योतिष विद्वानो की मंत्रणा एवं विवेचन के बाद निर्श्कष निकाला की पुण्य काल एवं स्नान प्रातः से पूर्ण दिवस पर्यन्त रहेगा ।
मकर संक्रांति का त्योहार हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में शामिल है, जो सूर्य के उत्तरायन होने पर मनाया जाता है। इस पर्व की विशेष बात यह है कि यह अन्य त्योहारों की तरह अलग-अलग तारीखों पर नहीं, बल्कि हर साल 15 जनवरी को ही मनाया जाता है, जब सूर्य उत्तरायन होकर मकर रेखा से गुजरता है।
कभी-कभी यह एक दिन पहले या बाद में यानि 14 या 15 जनवरी को भी मनाया जाता है लेकिन ऐसा कम ही होता है। मकर संक्रांति का संबंध सीधा पृथ्वी के भूगोल और सूर्य की स्थिति से है। जब भी सूर्य मकर रेखा पर आता है, वह दिन 15 जनवरी ही होता है, अतः इस दिन मकर संक्रांति का तेहार मनाया जाता है।
ज्योतिष की दृष्टि से देखें तो इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है और सूर्य के उत्तरायण की गति प्रारंभ होती है।
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में मकर संक्रांति के पर्व को अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। आंध्रप्रदेश, केरल और कर्नाटक में इसे संक्रांति कहा जाता है और तमिलनाडु में इसे पोंगल पर्व के रूप में मनाया जाता है। पंजाब और हरियाणा में इस समय नई फसल का स्वागत किया जाता है और लोहड़ी पर्व मनाया जाता है, वहीं असम में बिहू के रूप में इस पर्व को उल्लास के साथ मनाया जाता है। हर प्रांत में इसका नाम और मनाने का तरीका अलग-अलग होता है।
pandit sanjay sharma
ज्योर्तिविद पं. संजय शर्मा
अलग-अलग मान्यताओं के अनुसार इस पर्व के पकवान भी अलग-अलग होते हैं, लेकिन दाल और चावल की खिचड़ी इस पर्व की प्रमुख पहचान बन चुकी है। विशेष रूप से गुड़ और घी के साथ खिचड़ी खाने का महत्व है। इसेक अलावा तिल और गुड़ का भी मकर संक्राति पर बेहद महत्व है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर तिल का उबटन कर स्नान किया जाता है। इसके अलावा तिल और गुड़ के लड्डू एवं अन्य व्यंजन भी बनाए जाते हैं। इस समय सुहागन महिलाएं सुहाग की सामग्री का आदान प्रदान भी करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे उनके पति की आयु लंबी होती है।
मकर संक्रांति को स्नान और दान का पर्व भी कहा जाता है। इस दिन तीर्थों एवं पवित्र नदियों में स्नान का बेहद महत्व है साथ ही तिल, गुड़, खिचड़ी, फल एवं राशि अनुसार दान करने पर पुण्य की प्राप्ति होती है। ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन किए गए दान से सूर्य देवत प्रसन्न होते हैं।
इन सभी मान्यताओं के अलावा मकर संक्रांति पर्व एक उत्साह और भी जुड़ा है। इस दिन पतंग उड़ाने का भी विशेष महत्व होता है और लोग बेहद आनंद और उल्लास के साथ पतंगबाजी करते हैं। इस दिन कई स्थानों पर पतंगबाजी के बड़े-बड़े आयोजन भी किए जाते हैं।
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