शनिदेव के घनघोर तप ने पिघला दिया था महाकाल को, फिर ऐसे प्रसन्न हो गए थे सूर्यदेव!

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न्याय के देवता और कलयुग के भगवान शनि महाराज की पूजा के लिए शनिवार का दिन शुभ माना जाता है। अपनी टेढ़ी चाल से सबको डराने वाले शनिदेव की महिमा निराली हैं।
मनुष्य के अच्छे-बुरे काम का फल देने वाले शनिदेव की टेड़ी नजर पड़ जाए तो जातक थोड़े ही समय में राजा से रंक बन जाता हैं, जिस पर नजर पड़ जाए वो मालामाल हो जाता है। लेकिन अपने स्वयं के जीवन में भी शनिदेव ने भी कई मुश्किलों से सामना करना पड़ा तो कई श्राप भी झेलने पड़े हैं। आज शनिवार को शनिदेव से जुड़ी सच्ची चमत्कारी कहानी और रुठे शनि को मनाने की आसान पूजा बता रहे हैं। आज की कहानी की जो जु़ड़ी है शनिदेव के जन्म से। एक ऐसा मंदिर हैं जो सुनाता है शनिदेव की व्यथा की कहानी सुनाता है।



शक्तिशाली शनिदेव पर भी एक बार संकट आया था, जिसकी वजह से उनके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े हो गए थे। इस घटना का साक्षी है, हिमाचल के कांगड़ा जिला में महाकाल गांव में बना यह मंदिर। कांगड़ा के बैजनाथ भगवान से करीब 5 किमी दूर महाकाल मंदिर हैं। मान्यता है कि नासिक के बाद शनिदेव का मंदिर महाकाल में स्थित है।

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पढ़ें रोचक कथा
हिमाचल के कांगड़ा जिला में महाकाल गांव में बना यह मंदिर न सिर्फ शनिदेव पर आए संकट का गवाह हैं, बल्कि शिव और शनि के अटूट रिश्ते का आधार भी यही मंदिर हैं। भगवान शनि सूर्य और छाया के पूत्र हैं। लेकिन रंग-रुप एकदम अलग है। सूर्य चमकते-दमकते और शनिदेव तवे जैसे बिलकुल काले और उस पर उनका क्रोधी स्वभाव कहा जाता है कि सूर्य देव को एक बार संदेह हो गया, कि क्या वाकय शनि उनके पुत्र हैं? उनके इस शक को देवताओं ने और बढ़ाने का काम किया। पति के इस आरोप से छाया व्यथित हो उठी थीं। कहते हैं बड़े होने पर जब शनिदेव ने माता छाया से अपने पिता के बारे में पूछा तब मां ने पूरी कहानी बताई थी। तब शनिदेव ने लिए एक ऐसी मुश्किल थी, जिसका समधान करना जीवन का सबसे बड़ा मकसद बन गया। कहते है जब शनिदेव ने हिमाचल प्रदेश के इसी महाकाल मंदिर में शिव की आराधना के लिए घनघोर तप किया, तो शनि की पूजा और तप ने महाकाल को पिघला दिया। महाकाल के आशीर्वाद ने उन्हें इतना शक्तिशाली बना दिया कि इंसान क्या देवता भी उनसे खौफ खाते हैं।



इतना ही नहीं महाकाल ने सुर्य को भी विश्वास दिला दिया कि शनि उनके ही पूत्र हैं। उसी दिन से इस धाम में सूर्य और शनि देव की एक साथ पूजा की जाती है। यहां भक्त महाकाल के दर्शन करते है फिर की जाती हैं शनिदेव की पूजा। अगर ग्रहण या किसी विशेष दिन पूजा की जाए तो महाकाल संग शनिदेव का भी आशीर्वाद मिल जाता हैं। कहते हैं यहां पूजा करने वाले कभी खाली हाथ नहीं लौटे हैं। महाकाल की पूजा से शनिदेव भी प्रसन्न होते हैं।

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तंत्र साधना के लिए है खास
इस मंदिर के पंडित रामप्रसाद बताते हैं कि पांडवों ने महाकाल मंदिर का निर्माण किया था और मां कुंती के साथ यहां पूजा की थी। वहीं स्थानीय लोग कहते हैं कि यह मंदिर सप्त ऋषियों ने बनवाया था। मंदिर परिसर में 7 कुंड बने हुए हैं। मंदिर में आज भी चार कुंड मौजूद हैं। महाकाल मंदिर तंत्र साधना के लिए भी सिद्ध माना गया है।

 

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