वट सावित्री व्रत: जानिए महत्व, पूजन और मान्यता

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भारतीय महिलाओं में वट सावित्री अमावस्या का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस व्रत को करके महिलाएं पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। इस साल यह व्रत विशेष संयोग लेकर आ रहा है।

दरअसल शनि जयंती व स्नान, दान अमावस्या भी 25 मई को वट सावित्री व्रत पूजन के दिन ही हैं। इसलिए यह व्रत इस बार और अधिक फल देने वाला साबित होगा।

इस व्रत के बारे में मान्यताएं

वट सावित्री व्रत के बारें में महिलाओं में बेहद उत्साह रहता है। इस व्रत को करने के लिए महिलाएं पहले 108 बार बरगद की परिक्रमा करती हैं, फिर पूजन शुरू करती हैं। गुरुवार को वट सावित्री की पूजा से फल देने वाले योग बनते हैं।

कहा जाता हैं कि एक बार सावित्री वट वृक्ष के नीचे अपने मृत पति सत्यवान को यमराज से अपनी पूजा के बल पर लड़कर वापस ले आई थी। यही कारण है कि इस व्रत का महत्व काफी अधिक हैं। इसके बाद से ही यह पूजा होने लगी हैं। यह भी मान्यता है कि वट वृक्ष की पूजन के पश्चात ही सुहागन को पानी पीना होता है।
पूजन का तरीका
अलग-अलग पंडित इस पूजन के अलग-अलग तरीके बताते हैं, लेकिन हिंदू धर्म की परंपरा के मुताबिक विवाहित महिलाएं नित्य कर्म से पूर्ण होने के बाद नाहकर वट वृक्ष को जल से शुद्ध करती हैं। इसके बाद वे हल्दी से तिलक, सिंदूर व चंदन का लेप लगाकर पूजन करती हैं। फल व फूल हों, तो वे भी चढ़ा सकते हैं।

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