विजया दशमी-दशहरा, जानिए परंपरा और पौराणिक महत्व

“निर्णय सिंधु” नामक धर्म ग्रन्थ के अनुसार , प्राचीन काल से आज तक इस सनातन त्यौहार को सारी सृष्टी शक्ति स्वरूपा माँ जगतजननी को प्रणाम करके मनाती आ रही है।

देखा जाय तो दशहरा केवल एक पर्व नही बल्कि एक संकल्प है बुराई के नाश की । जिसे भारत देश के विभिन्न राज्यो के आलावा विश्व के ओर भी कई देशो में मनाया जाता है।

“आइये आपको बहुत ही अनमोल जानकारियों से अवगत कराता हूँ। (कापी- पेस्ट करने वालों से निवेदन है कि बहुत ही मेहनत करके लिखे इस लेख में किसी प्रकार से काट छाँट न करें। “” पण्डित मनोज शुक्ला)

भगवान राम के पिता जी सूर्यवंशी अयोध्या नरेश महाराज दशरथ,

माता चन्द्रवंशी हैहय राजा कौसल नरेश की बेटी कौशिल्या ,

नाना जी हैहयवंशी कोसल नरेश महाराज भानुमान,



धर्मपत्नी सीता (जानकी)

सास-ससूर मिथिला नरेश महाराजा जनक व महारानी सुनयना

अप्रतिम महापण्डित रावण के पिता, भगवान ब्रह्मा जी के मानस पुत्र ऋषि पुलस्त्य के बेटा ऋषि विश्रवा

माता राक्षस राज सुमाली की सुपुत्री कैकसी ,

पत्नी मन्दोदरी

तथा सास-ससुर पुरायुग के वैज्ञानिक मयासुर व अप्सरा हेमा थी।

राम व रावण दोनों ही परम् शिवभक्त थे। भगवान राम ने जब सेतुबन्ध रामेश्वर की पूजा किया तो अनुष्ठान कर्ता आचार्य के रूप में पण्डित रावण ही था।

दशहरा का पर्व पूरी तरह से राम व रावण पर ही आधारित है। आश्विन शुक्ल दसमी लंकापति रावण के परांगमुख होने का दिन है। रावण के कार्यो से उस समय देवता,ऋषि-मुनि व मानव सभी त्रस्त हो गए थे। तब से लेकर आज तक प्रतीकात्मक रूप से दशहरे पर रावण दहन किया जाता है।

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विजयादशमी –

धर्म शास्त्रो के अनुसार भगवान श्रीराम चन्द्र जी ने आसुरी शक्ति के उच्छेदन के लिये शक्ति संचय हेतु नवरात्र देवी पूजन कर अपराजिता या विजया देवी का पूजन किया था इसलिये इसे विजयादशमी भी कहते है।

ज्योतिष के मुहूर्त व संहिता ग्रन्थो में आया है कि दशहरे के दिन अपने कुल परम्परा के आयुध,कार्योपयोगी यन्त्र-साधनो की तथा अपने वाहनों की विधि विधान से पूजन करना चाहिए। नवीन वस्त्र आभूषण धारण करना चाहिए।

दशहरे के दिन शस्त्र पूजा के सम्बन्ध में कई कथाएँ है।

भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त करने के लिये शक्ति की देवी दुर्गा जी सहित शस्त्रो की पूजा किया था।
राम जी क्षत्रिय थे इसलिये दशहरे के दिन क्षत्रिय विशेष कर इस पर्व को मनाते है।

देवराज इंद्र ने दशहरे के दिन ही असुरों पर विजय प्राप्त किया था।

इसी दिन पांडव अपने अज्ञात वास के पश्चात वापस पांचाल आये थे जहाँ पर अर्जुन ने धनुर्विद्या की निपूर्णता के आधार पर स्वयंबर में द्रोपती को जीता था।
राजा विक्रमादित्य , दशहरे के दिन ही देवी हरसिद्धि की पूजा आराधना किये थे।

छत्रपति शिवा जी ने इसी दिन माँ दुर्गा जी को प्रसन्न करके तलवार प्राप्त किया था।( जिसे भवानी के नाम से जाना जाता है )तब से महाराष्ट्र में शस्त्र पूजा आज भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।

ये सभी घटनाएँ शस्त्र पूजा की परम्परा से सम्बंधित है।

नीलकण्ठ दर्शन –

इसके पीछे एक कथा प्रचलित है । एक बार महाराजा मान्धाता त्रैलोक्य प्रसिद्ध महायज्ञ कर रहे थे । समस्त देवगण प्रत्यक्ष रूप से वहाँ उपस्थित थे। इसी बीच राक्षस राज रावण के पुष्पक विमान को वहाँ आते देखकर उनके द्वारा अपमान कर देने के डर से सभी देवता गण विभिन्न पक्षियों का रूप बना लिये। भगवान शंकर को डर तो नही था लेकिन सभी देवताओ को साथ देने के चलते वे भी एक पक्षी बन गए जो नीलकण्ठ के नाम से जाना जाने लगा। भगवान ने नीलकण्ठ को वरदान दिया कि लोग तुझे मंगलकारी मानकर दर्शन करेंगें।

शकुन शास्त्र में दशहरा ही नही बल्कि हर शुभ कार्य में नीलकण्ठ का दर्शन मंगलकारी बताया गया है।

पेड़ पोधो का सम्मान व पूजन-

महाभारत में अज्ञातवास के समय पांडवों ने घने पत्तो वाले खेजड़ी(शमी) के पेड़ पर अपने सभी शस्त्र छुपा कर रखे थे। इसलिये शमी को बहुत ही पवित्र और गुणदायक माना जाता है।

धर्म सिंधु व निर्णय सिंधु जैसे सर्वमान्य ग्रन्थ तथा अथर्व वेद में तो शमी वृक्ष के पूजन का वर्णन दिया है।
आधुनिक भूवैज्ञानिकों द्वारा शोध से यह पता चला है कि यह वृक्ष भूमिगत हलचलों की भविष्य वाणी में सहयोग करने की दृष्टी से बहुत महत्त्वपूर्ण है। राजस्थान में इस पेड़ की रक्षा के लिये अमृतादेवी के साथ सैकड़ो लोगो के बलिदान का इतिहास जुड़ा हुआ है।

दरकागल जैसे विषय ग्रन्थ तथा स्कंदपुराण में तो शमी पेड़ के पूजा का मन्त्र भी दिया गया है।

“शमी शमयते पापम् शमी शत्रु विनाशिनी। धरियर्जुनबाणानाम् रामस्य प्रियवादिनी ।। करिष्यमाणाम् या यात्रा यथाकालम् सुखम् मया । तत्र निर्विघ्नकर्त्री त्वम् भव श्रीरामपुजिते ।।

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दशहरा एक रूप अनेक –

भारत देश के अलग अलग राज़्यों व क्षेत्रों में दशहरे का स्वरूप भिन्न है।

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में दशहरा को देवताओं के मिलन का मेला मानकर मनाया जाता है। यहाँ 7 दिनों का दशहरा त्यौहार मनाया जाता है।

दक्षिण भारत में कर्नाटक मैसूर का दशहरा अपनी भव्यता व तड़क भड़क के लिये विश्व प्रसिद्ध है। 15वी शताब्दी के राजा कृष्ण देव राय ने इस उत्सव को राजकीय संरक्षण दिया था।

manoj shukla mahamaya mandir raipur
पंडित मनोज शुक्ला महामाया मंदिर रायपुर

तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में 9 दिनों तक माँ दुर्गा,लक्ष्मी व सरस्वती का पूजन किया जाता है। यहाँ रावण दहन नही किया जाता ।

प.बंगाल ,असम व उड़ीसा में दशहरा 4-5 दिनों तक चलने वाला प्रमुख त्यौहार है। यहाँ की स्त्रियाँ देवी के मस्तक पर सिंदूर लगाकर आपस में सिंदूर खेलती है। यहाँ दुर्गा पूजन का बहुत अधिक महत्त्व है।

महाराष्ट्र में दशहरे पर भाई चारे के प्रतीक के रूप में आपटा पेड़ के पत्तियों को सोनपत्ति मान कर बाँटने की प्रथा है। इसकी शुरुआत बिंबा जी राव भोंसले ने किया था।

कोटा राजस्थान की दशहरा 500 सालों से हड़ोती में खास ढंग से मनाया जाता है। 25 दिनों तक चलने वाला यह उत्तर भारत का यह सबसे प्राचीन दशहरा माना जाता है।

छत्तीसगढ़ में 9 दिन तक माँ दुर्गा के पूजन कर 10वें दिन रावण की
वृहदाकार पुतला बनाकर राम लीला का मंचन करके रावण को जलाने की परम्परा है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर की दशहरा में रावण वध नही बल्कि बस्तर की अधिष्ठात्री देवी दन्तेश्वरी माई की आराधना पूजन कर विशाल शोभा यात्रा निकाली जाती है। अलग अलग 12 रस्मों को लेकर मनाया जाने वाला देश ही नही बल्कि पुरे विश्व का एक मात्र पर्व है जो 75 दिनो तक चलता है।

दशहरा से मिलते जुलते पर्व दुनिया के कई देशो में मनाएं जाते है। हम लोग रावण का पुतला जलाते है। वहीँ अन्य देशो में किसी न किसी दुष्ट चरित्र का पुतला जलाया जाता है।

आईये देखे दशहरा सरीखे पर्व-

यूनान में अक्टूबर की प्रथम पूनम को क्रोशगा नामक एक दुष्ट राजा का पुतला जलाया जाता है।

पूर्वी द्वीप समूह में अक्टूबर माह में “पेसन प्लेज” नाम का नाटक मंचन किया जाता है जिसमे भगवान के कष्ट भोगने का चित्रण रहता है।

जावा द्वीप में रामायण पर आधारित राम रावण युद्ध (राम लीला) का नाटक किया जाता है। यहाँ के मन्दिरों में वाल्मीकि रामायण के श्लोक जगह जगह अंकित है।

सुमात्रा द्वीप के जनजातियो के जीवन में रामायण उसी तरह रचा बसा है जैसे भारतवासियों के जीवन में ।

बाली द्वीप में आर्य संस्कृति ही आधार स्तम्भ है रामायण का प्रचार यहाँ के घर घर में है।

पेरू में राजा अपने आपको केवल सूर्यवंशी ही नही बल्कि “कौशिल्या सुत राम” के वंशज भी कहते है। यहाँ “राम सीतव” नाम से राम सीता उत्सव मनाया जाता है।

इंडोनेशिया में वहाँ के धार्मिक राजा की हत्या कर देने वाली एक सुंदरी की पुतला बनाकर हर वर्ष जलाने की प्रथा है।

मलेशिया में रामकथा का प्रचार है। यहाँ के मुसलमान भी अपने नाम के साथ राम लक्ष्मण व सीता जी के नाम को जोड़ते है। यहाँ रामायण को “हिकायत सेरीराम” कहते है।

कम्बोडिया में रामायण के साथ साथ हिन्दू सभ्यता का प्रचलन बहुत है। वहाँ की सबसे बड़ी नदी का नाम सरयू है। 1995 में यहाँ रामायण महोत्सव का आयोजन किया गया था जिसमे 6 देशों के कलाकार आयें थे।

थाईलैंड के पुराने रजवाड़ों में भरत की तरह ही भगवान राम की पादुकायें लेकर राज्य करने की परम्परा है। ये अपने को रामवंशी मानते है। यहाँ अजुधिया , लवपुरी , जनकपुर जैसे नाम वाले शहर है।

जापान में राम लीला का आयोजन किया जाता है। यहाँ की संस्कृति में हिन्दू त्योहारो का बड़ा ही महत्व है।

चीन में बड़े बड़े पुतले बनाकर उसमे फटाखे भर कर आग लगा दी जाती है आग लगते ही युवा पीढ़ी ख़ुशी से थिरकते है। आतिशबाजी का दौर चलता है फिर आसमान में बड़े बड़े गुब्बारे उड़ाए जाते है।



मास्को में दशहरे के दिन राम की विशेष शोभा यात्रा निकाली जाती है।

ऑस्ट्रेलिया के कुछ क्षेत्रों में दो पहलवानों में राम रावण युद्ध का नाटक मंचन किया जाता है जो हार जाता है उसकी शक्ल का विचित्र पुतला बनाकर दर्शको के सामने जलाया जाता है।

मिश्र में अक्टूबर माह में वहाँ के आदिवासी एक दैत्य का पुतला बनाकर जलाते है।

बेबिलिनिया में वहाँ की स्त्रियाँ प्रतिवर्षं एक युवक की मूर्ति जलाकर दशहरे जैसा एक त्यौहार मनाते है।

नाइजीरिया में शक्ति की देवी डायना की सात दिन तक उपासना पूजा करते है। और आठवे दिन उस मूर्ति की परिक्रमा करके शक्ति की कामना करते है।

अफ्रीका के जुलु जनजाति के लोग अक्टूबर के पहले सप्ताह में रावण की तरह ही चार मुख वाला पुतला बनाकर जलाते है। आतिशबाजी करके आसमान को रंग बिरंगे करते है।

श्रीलंका में रामायण को लोकगीतों के आलावा रामलीला की तरह ही नाटक का मंचन किया जाता है।

बर्मा में भगवान राम के नाम पर ही बहुत से नाम रखे जाते है यहाँ रामवती नगर में राम लक्ष्मण सीता व हनुमान जी के चित्र अंकित है।

रूस की राजधानी मास्को में पिछले 30 सालों से रामलीला का बैले के रूप में मंचन हो रहा है।

अमेरिका में रामलीला का मंचन” हरे राम हरे कृष्ण सम्प्रदाय ” के द्वारा कराया जाता है।

नेपाल में राम चरित मानस पर आधारित राम लीला का प्रचार प्रसार अधिक है।

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