रुठी महालक्ष्मी को ऐसे करें प्रसन्न, इंद्र ने भी इसी तरीके से मनाया था उन्हें

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धन और एश्वर्य की देवी महालक्ष्मी की आराधना हर दिन करनी चाहिए। ऐसा शास्त्रों में लिखा है। लोग कड़ी मेहनत के बाद भी आर्थिक रूप से कमजोर हैं, तो उन्हें महालक्ष्मी को मनाने के लिए एक अनूठा तरीका अपनाना चाहिए, इस तरीके को अपनाकर इंद्र ने भी उन्हें प्रसन्न किया था।
महालक्ष्मी की कृपा से असीम संपदा मिलती है। माना जाता है कि तीनों लोकों में सबसे अधिक संपदा और एश्वर्य जिसके पास है, वो है देवराज इंद्र, मगर देवराज इंद्र को भी एक बार अपने घंमड के चलते एश्वर्य से विहिन होना पड़ गया था। फिर इंद्र ने एक विशेष तरह की पूजा से लक्ष्मी की कृपा फिर से प्राप्त की।
शास्त्रों में लिखा है कि एक बार इंद्र ऐरावत हाथी पर चढ़कर जा रहे थे, रास्ते में दुर्वासा मुनि मिले। मुनि ने अपने गले में पड़ी माला निकालकर इंद्र के ऊपर फेंक दी। जिसे इंद्र ने ऐरावत हाथी को पहना दी। तीव्र गंध से प्रभावित होकर ऐरावत हाथी ने सूंड से माला उतारकर पृथ्वी पर फेंक दी। यह देख दुर्वासा मुनि ने इंद्र को श्राप दिया, इंद्र! एश्वर्य के घमंड में तुमने मेरी दी माला का आदर नहीं किया। यह माला नहीं, लक्ष्मी का धाम थी। इसलिए तुम्हारे अधिकार में स्थित तीनों लोकों की लक्ष्मी शीघ्र ही अदृश्य हो जाएगी। श्राप का असर तत्काल हुआ। देवाओं-मुनियों ने अभिषेक किया। तो देवी महालक्ष्मी की कृपा से पूरा विश्व समृद्धशाली और सुख-शांती से सपन्न हो गया। देवराज इंद्र ने उनकी इस प्रकार स्तुति की।

-लक्ष्मीजी की मूर्ति पंचामृत से अभिषेक किया गया।
-केशर, रोली, चांवल, पान, सुपारी, फल, फूल, दूध, खीर-बताशे, सिंदूर, शहद, सिक्के, लोंग आदि अर्पित करके पूजन किया गया।
-इंद्र ने हाथ जोड़कर कहा, श्रीपाठ पर स्थित और देवताओं से पूजित होने वाली हे महामाये। तुम्हें नमस्कार है। हाथ में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली हे महालक्ष्मी, तुम्हें प्रणाम है। इसके बाद महालक्ष्मी प्रसन्न हुई।

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