होलाष्टक 2018 से आठ दिन मांगलिक कार्य वर्जित, पढ़ें होलिका दहन की कथा

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भारतीय शास्त्रनुसार होलाष्टक होली दहन से पहले आठ दिनों का वो क्रम है जिसमे कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता है… पंडित पी. एस. त्रिपाठी से जानिए होलाष्टक फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक के बीच के आठ दिनों की अवधि को कहा जाता है… शास्त्रीय मान्यता के अनुसार होलाष्टक में नामकरण, विद्या आरंभ, कर्ण छेदन, अन्न प्राशन, चैलकर्म, उपनयन संस्कार, विवाह संस्कार, ग्रह प्रवेश तथा वास्तु पूजन आदि मांगलिक कार्य वर्जित हैं… होलाष्टक की मान्यता उत्तर भारत में अधिक मानी जाती है…

होलाष्टक का ज्योतिषीय आधार

होलाष्टक के दौरान शुभ कार्य न होने के पीछे ज्योतिषीय मान्यता भी है… ज्योतिषशास्त्र अनुसार फाल्गुन माह की अष्टमी तिथि को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूनम को राहु उग्र रूप लेकर मलीन हो जाते हैं।



जिसके कारण व्यक्ति गलत निर्णय लेने लगता है। ऐसा न हो इसी कारण आठ दिनों में उसे किसी भी शुभ काम का फैसला लेने की मनाही होती है.. क्योंकि होली का खुमार होता है और फाल्गुन अष्टमी से आठ दिन व्यक्ति का मस्तिष्क अष्ट ग्रहों की नकारात्मक शक्ति के क्षीण होने पर सहज मनोभावों की अभिव्यक्ति रंग, गुलाल आदि द्वारा प्रदर्शित की जाती है …

 

होलाष्टक पूजन की विधि 

होली से 8 दिन पूर्व ही होलिका दहन वाली जगह पर गंगा जल छिड़ककर उसे पवित्र कर लिया जाता है और वहां पर सूखी लकड़ी, उपले और होली का डंडा स्थापित कर दिया जाता है। जिस दिन डंडा गाड़ा जाता है, उसी दिन से होलाष्टक की शुरुआत मानी जाती है। डंडा गाड़ने से लेकर होलिका दहन के दिन तक सभी मांगलिक कार्य वर्जित बताए गए हैं. भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के अपराध में कामदेव को शिव जी ने फाल्गुन की अष्टमी में भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति ने उस समय क्षमा याचना की और शिव जी ने कामदेव को पुनः जीवित करने का आश्वासन दिया। इसी खुशी में लोग रंग खेलते हैं.होली से आठ दिन पहले होलिका दहन वाले स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर उसमें सूखे उपले, सूखी लकडी, सूखी ख़ास व होली का डंडा स्थापित कर दिया जाता है। जिस दिन यह कार्य किया जाता है, उस दिन को होलाष्टक प्रारम्भ का दिन भी कहा जाता है।इस दिन, होलाष्टक शुरु होने वाले दिन होलिका दहन स्थान का चुनाव किया जाता है। इस दिन इस स्थान को गंगा जल से शुद्ध कर, इस स्थान पर होलिका दहन के लिये लकडियां एकत्र करने का कार्य किया जाता है।

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इस दिन जगह-जगह जाकर सूखी लकडियां विशेष कर ऐसी लकडियां जो सूखने के कारण स्वयं ही पेडों से टूटकर गिर गई हों, उन्हें एकत्र कर चैराहे पर एकत्र कर लिया जाता है। होलाष्टक से लेकर होलिका दहन के दिन तक प्रतिदिन इसमें कुछ लकडियां डाली जाती है। इस प्रकार होलिका दहन के दिन तक यह लकडियों का बड़ा ढेर बन जाता है। इस दिन से होली के रंग फिजाओं में बिखरने लगते हैं। अर्थात होली की शुरुआत हो जाती है…

होली 2018 का मुहूर्त

1 मार्च होलिका दहन मुहूर्त- 18:16 से 20:47
भद्रा पूंछ- 15:54 से 16:58

भद्रा मुख- 16:58 से 18:45
रंगवाली होली- 2 मार्च
पूर्णिमा तिथि आरंभ- 08:57 (1 मार्च)
पूर्णिमा तिथि समाप्त- 06:21 (2 मार्च)

होलिका दहन की कथा

हिंदू पुराणों के मुताबिक जब दानवों के राजा हिरण्यकश्यप ने देखा कि उसका पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु की आराधना में लीन हो रहा है। तो उन्हें अत्यंत क्रोध आया।



उन्होने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए, क्योंकि होलिका को यह वरदान था कि वह अग्नि में जल नहीं सकती है। लेकिन जब वह प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी तो वह पूरी तरह जलकर राख हो गई। नारायण के भक्त प्रहलाद को एक खरोंच तक नहीं आई। तब से इसे आज तक पर्व के इसी दृष्य की याद में मनाया जाता हैं, जिसे होलिका दहन कहते हैं। यहां लकड़ी को होलिका समझकर उसका दहन किया जाता है। जिसमें सभी हिंदू परिवार समान रुप से भागीदार होते हैं।

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