होली के रंग बदल देंगे भाग्य

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रायपुर. होली का त्योहार साल 2018 में मार्च माह में आया है। परंपरागत तरीकों से मनाए जाने वाले इस त्योहार में हिंदू ही नहीं सभी धर्मों के लोग उत्साह से मनाते हैं। पंडित पी. एस. त्रिपाठी हमें होली त्योहार पर सावधानियों के बारे में बता रहे हैं, कि राशि अनुसार क्या-क्या सावधानियां रखकर इस त्योहार को मनाएं।
हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार, होलिका दहन, जिसे होलिका दीपक और छोटी होली के नाम से भी जाना जाता है, को सूर्यास्त के पश्चात प्रदोष के समय, जब पूर्णिमा तिथि व्याप्त हो, करना चाहिये। भद्रा, जो पूर्णिमा तिथि के पूर्वाद्ध में व्याप्त होती है, के समय होलिका पूजा और होलिका दहन नहीं करना चाहिये। सभी शुभ कार्य भद्रा में वर्जित हैं। पंडित पी. एस. त्रिपाठी से जानिए साल 2018 में किस दिन हैं होली और राशि अनुसार उपाय से बदल जाएगी आपका किस्मत…

यह सावधानियां रखें होली के दिन

मेष- मां का स्वास्थ्य, वाहन की मरम्मत, उदर विकार, आहार का संयम।
वृषभ- ठंडी वस्तुएं न खाएं, पिता का स्वास्थ्य और बॉस से संबंध बनाकर रखें।
मिथुन – किसी प्रकार के अहंकार का त्याग करें। वाहन चलाते समय सावधान रहें।

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कर्क- आहार का संयम करें। किसी न उलझें।
सिंह- होली खेलते समय विवादों से दूर रहें, यदि हड्डियों का रोग हैं, तो दवा लें लें, कमर का दर्द संभव।



कन्या- क्रोध का त्याग करें। किसी भी चीज के लिए आतुर न हों, वाणी पर संयम रखें
तुला- व्यसन से बचें।
वृश्चिक- क्रोध से बचें।
धनु- अत्यधिक तनाव में न आएं।
मकर- वाहन और पशुओं से बचें।
कुंभ- शत्रुओं के षडय़ंत्र से बचें।
मीन- विवादों से दूर रहें।

 

होली 2018 का मुहूर्त

1 मार्च होलिका दहन मुहूर्त- 18:16 से 20:47
भद्रा पूंछ- 15:54 से 16:58



भद्रा मुख- 16:58 से 18:45
रंगवाली होली- 2 मार्च
पूर्णिमा तिथि आरंभ- 08:57 (1 मार्च)
पूर्णिमा तिथि समाप्त- 06:21 (2 मार्च)

होलिका दहन की कथा

हिंदू पुराणों के मुताबिक जब दानवों के राजा हिरण्यकश्यप ने देखा कि उसका पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु की आराधना में लीन हो रहा है। तो उन्हें अत्यंत क्रोध आया। उन्होने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए, क्योंकि होलिका को यह वरदान था कि वह अग्नि में जल नहीं सकती है। लेकिन जब वह प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी तो वह पूरी तरह जलकर राख हो गई। नारायण के भक्त प्रहलाद को एक खरोंच तक नहीं आई। तब से इसे आज तक पर्व के इसी दृष्य की याद में मनाया जाता हैं, जिसे होलिका दहन कहते हैं। यहां लकड़ी को होलिका समझकर उसका दहन किया जाता है। जिसमें सभी हिंदू परिवार समान रुप से भागीदार होते हैं।


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