क्या हज के हक में है सब्सिडी का खत्म हो जाना

haj subsidy in hindi

centre ends haj subsidy as part of policy to empower minorities without appeasement

हज मुसलमानों के पांच मूलभूत कर्तव्यों में शामिल है। बचपन से ही उसके मन की गहराइयों में यह पैठ जाता है कि कैसे भी हो एक बार उसे पवित्र शहर की यात्रा कर उस आध्यात्मिकता को महसूस करना है, जो पूरे दीन को रोशनी दे रही है। हालांकि बाकी कर्तव्यों के मुकाबले हज सिर्फ उन मुसलमानों के लिए कर्तव्य है, जो इसे कर सकते हैं। यानी जो हज के लिए शारीरिक और आर्थिक रूप से सक्षम हैं। सब्सिडी खत्म कर सरकार ने इसे और इस्लामिक बना दिया है, क्योंकि दूसरों के रुपए से किया गया हज मान्य नहीं होता। वैसे भी सुप्र्रीम कोर्ट ने इस सब्सिडी की मियाद 2022 तक ही तय की थी।



हज को लेकर परंपराओं की सख्ती का अंदाजा इसी बात से भी लगाया जा सकता है कि देश में इतने मुगल बादशाह हुए, लेकिन कोई भी हज के लिए नहीं जा सका। सिर्फ औरंगजेब अकेले ऐसे मुगल बादशाह माने जाते हैं, जो हज जाने के काबिल थे, क्योंकि वे जनता से वसूले गए कर की राशि का व्यक्तिगत इस्तेमाल नहीं करते थे। खुद का खर्च चलाने के लिए टोपियां सिलते थे और कुरान की कॉपी बनाते थे। सिर्फ उन्हीं के पास अपनी मेहनत की कमाई थी, बाकी के तमाम मुगल बादशाहों की सारी दौलत जनता की गाढ़ी कमाई का हिस्सा थी। इस वजह से वे हज जाने के योग्य ही नहीं थे। इन बादशाहों में अकबर महान तक शामिल है।



हालांकि बावजूद इसके हज पर कोई 85 बरस से सब्सिडी दी जाती रही है। 1932 में अंग्रेजों ने हज कमेटी एक्ट बनाया था। उसके बाद से ही यह व्यवस्था शुरू हुई थी। हालांकि इसमें समय-समय पर कई बदलाव भी हुए। खासकर आजादी के बाद 1959 में एक्ट में बदलाव किए गए और हज यात्रियों की सुविधाओं का ध्यान रखने के लिए बॉम्बे में एक कमेटी ही बना दी गई। 1973 में भी सब्सिडी में कुछ बदलाव किए गए। हालांकि तब तक समुद्र के रास्ते से ही हज यात्रा होती थी। 1995 में इसे पूरी तरह बंद कर हवाई जहाज से ही यात्रा की अनुमति दी गई। हालांकि इस बार फिर इसे खोला जा रहा है।



हज यात्रा पर सब्सिडी के रूप में मूलत: हवाई किराए में छूट दी जाती रही है। ठहरने, चिकित्सा व भोजन के इंतजाम भी किए जाते हैं, लेकिन मूल रूप से यह किराए में राहत के रूप में जानी जाती है और इस पर विवाद की बड़ी वजह भी यही है। हिंदू इसे मुस्लिम तुष्टिकरण के प्रतिबिम्ब की तरह देखते आए हैं तो मुस्लिम बाद के वर्षों में इसे एयर इंडिया की मदद करने का एक सरकारी षड्यंत्र करार देने लगे थे। क्योंकि छूट का सारा पैसा घाटे में डूबी एयर इंडिया के खाते में जा रहा था।



वैसे भी सब्सिडी के अनुपात में हज यात्रियों की संख्या ऊपर-नीचे होती रही है। 1994 में 21 हजार 35 लोग भारत से हज यात्रा पर गए थे, उस वक्त यात्रा की लागत महज 1700 रुपए बताई जाती है। तब सरकार ने यात्रियों को 10.51 करोड़ रुपए की सब्सिडी दी थी। 2011 में लागत बढक़र 54 हजार 800 रुपए हो गई, उस वक्त 1 लाख 25 हजार लोग हज के मुकद्दस सफर पर गए थे। यानी लागत बढऩे से लोग कम नहीं हुए, बल्कि बढ़े थे। इस वर्ष सब्सिडी 685 करोड़ रुपए रही।



इसके बाद 8 मई 2012 को सुप्रीम कोर्ट ने नई व्यवस्था दे दी। जस्टिस रंजन देसाई और जस्टिस आफताब आलम की युगल पीठ ने सब्सिडी की व्यवस्था को 2022 तक यानी 10 वर्षों में खत्म करने का निर्णय दिया था। इसी के मद्देनजर तब से ही सब्सिडी घटाई जाना चाहिए थी, हालांकि कुछ वर्ष ऐसा नहीं हुआ। 2014 में प्रति व्यक्ति सब्सिडी 35 हजार थी, जबकि वास्तविक खर्च करीब ट्रेवल क्लास के हिसाब से 63 हजार 750 से 1 लाख 64 हजार रुपए के बीच था। 2016 में सब्सिडी 45 हजार रुपए कर दी गई थी, लेकिन 2017 में सरकार ने सब्सिडी अनुमानित खर्च का 50 फीसदी कर दी थी।
सब्सिडी के विरोध की बड़ी वजह हवाई किराया ही रहा है। आम दिनों में बॉम्बे से जेद्दाह का किराया 32 हजार रुपए होता है, लेकिन हज के दौरान यह 65 हजार कर दिया जाता है।



हज यात्रियों को उम्मीद है कि एयर इंडिया पर निर्भरता खत्म होने के बाद अब उन्हें बेहतर और सस्ते ऑप्शन मिल पाएंगे। हज का सफर वे पूरी तरह अपने पैसों से करेंगे और रुहानी सुकून महसूस करेंगे। बाकी लोग इस लिहाज से खुश है कि अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा तुष्टिकरण का एक जरिया खत्म हो गया है। सब्सिडी की जो राशि बचेगी उसे अल्पसंख्यक महिलाओं की शिक्षा पर खर्च करने का भरोसा जताया गया है। उस भरोसा करने व न करने के सभी के पास अनगिनत तर्क होंगे ही।

-अमित मंडलोई (लेखक पत्रिका इंदौर के स्थानीय संपादक हैं)

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