एक छत के नीचे विराजे हैं चिंतामन, सिद्धिविनायक और इच्छामण गणेश, गारंटी से पूरी करते हैं मनोकामना

chintaman ganesh temple ujjain madhya pradesh in hindi

(chintaman ganesh temple ujjain madhya pradesh in hindi)

उज्जैन. भगवान गणेश के इस मंदिर में एक साथ तीन गणपति के तीन रूप एक छत के नीचे विराजते हैं। भक्तों को एक बार भी दर्शन का सौभाग्य मिल गया तो भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी होने की गारंटी है। यहां आसमान में लहराती धर्म पताका पल-पल किसी शक्ति का अहसास करवाती हैं, यह अहसास तब और गहरा हो जाता हैं जब एक ही छत के नीचे सिद्धी और भक्ति के दर्शन तीन अलग-अलग स्वरूपों में होते हैं। भगवान गणेश के इन तीन अलग-अलग स्वरूपों के दर्शन कर परिणय सूत्र में बंधे जोड़े यहां आशीर्वाद लेकर नए जीवन की शुरुआत करते हैं।



उज्जैन से करीब 5 किमी दूर भगवान गणेश का धाम बसा हैं। मंदिर में समस्त चिंताओं को हरने वाले चिंतामन गणेश वहीं सिद्धिविनायक और इच्छामण गणेश मंद-मंद मुस्कान से भक्तों का स्वागत करते हैं और आशीर्वाद देते हैं। यह तीनों मूर्तियां स्वयंभू हैं। कहते हैं तीनों गणेश एक बार शुभ कार्य का भार अपने ऊपर ले लेते हैं तो गारंटी के साथ काम पूरा करके ही छोड़ते हैं। पहले भक्त माथा टेकने के लिए आते है ,कहा जाता है की यहाँ विराजित गणेश स्वम्भू है और जब भगवन राम , लक्ष्मण और सीता के साथ विश्राम के लिए रुके थे तभी गणेश जी प्रकट हुए थे और भगवन राम ने पहली पूजा की थी।

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होती हर भक्त की मनोकामना पूरी
देश के कोने-कोने से भक्त यहां दर्शन करने आते है। यहां पर भक्त, गणेश जी के दर्शन कर मंदिर के पीछे उल्टा स्वास्तिक बनाकर मनोकामना मांगते है और जब उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है तो वह पुनः दर्शन करने आते है और मंदिर के पीछे सीधा स्वास्तिक बनाते है। कई भक्त यहां नाड़े के रूप में रक्षा सूत्र बांधते है और मनोकामना पूर्ण होने पर रक्षा सूत्र छोड़ने आते है। श्री चिंताहरण गणेश जी की ऐसी अद्भूत और अलोकिक प्रतिमा देश में शायद ही कहीं होगी। यहां इनका सिर्फ हाथी की सूण्ड वाले मस्तक ही है और आस-पास भक्त की इच्छा पूर्ण करने वाले, इच्छामण, सिद्धि देने वाले सिद्धिविनायक के साथ समस्त चिंता को दूर करने वाले चिंतामण गणेश जी विराजमान है।

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विशेष श्रृंगार के साथ ऐसे करते हैं पूजन
विशेषकर इनका श्रृंगार सिंदूर से किया जाता है। श्रृंगार से पहले दूध और जल से इनका अभिषेक किया जाता है और विशेष रूप से मोदक एवं मोतीचूर के लड्डू का भोग इन्हें अत्यन्त प्रिय है। यहां पर बुधवार के दिन भक्तों को विशेष रूप से तांता लगता है। इनको तीन पत्तों वाली दूब भक्तों द्वारा चढाई जाती है। हर त्यौहार और उत्सव पर तरह-तरह के श्रृंगार विशेष रूप से किये जाते है। यहाँ चेत्र मास के प्रत्येक बुधवार को मेला लगता हे। चिंतामण गणेश की आरती दिन में तीन बार होती है प्रातः कालिन आरती, संध्या भोग आरती, रात्री शयन आरती। आरती में ढोल, डमाके और ताशों की गूंज ऐसी होती है कि आरती में शामिल हर कोई भक्त मग्न हो जाता है।

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विशेष अवसरों पर खासतौर से बादला चमक से श्रृंगार किए जाने के बाद गणेश जी का सौंदर्य देखते ही बनता है, ऐसा लगता है, मानो भगवान गणेश को हीरे- जवाहरात का श्रृंगार किया गया हो। यहां जिसकी शादी नहीं होती या जिसके यहां बच्चा नहीं होता वो आकर उल्टा स्वस्तिक बनाते है और मन्नत मांगते है। उज्जैन के मालवा क्षेत्र में सैंकड़ो वर्षों से परम्परा चली आ रही कि जो भी कोई शादी करता है तो उसके परिजन लग्न यहां लिखवाने आते है और शादी के बाद पति-पत्नी दोनों ही यहां आकर दर्शन करते है और वो लग्न यहां चिंतामण जी के चरणों में छोड़कर जाते है। दोनों पति-पत्नी चिंतामण गणेश जी प्रार्थना करते है कि हमारी सारी चिंताओं को दूर कर हमे सुखी जीवन प्रदान करना। चिंतामणी गणेश चिंताओं को दूर करते हैं, इच्छामणी गणेश इच्छाओं को पूर्ण करते हैं और सिद्धिविनायक रिद्धि-सिद्धि देते हैं। इसी वजह से दूर-दूर से भक्त यहां खिंचे चले आते हैं। स्वयं-भू स्थली के नाम से विख्यात चिंतामण गणपति की स्थापना के बारे में कई कहानियां प्रचलित है।

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भगवान राम ने भी की थी यहां पूजा
ऐसा माना जाता है कि राजा दशरथ के उज्जैन में पिण्डदान के दौरान भगवान श्री रामचन्द्र जी ने यहां आकर पूजा अर्चना की थी। सतयुग में राम, लक्ष्मण और सीता वनवास पर थे तब वे घूमते-घूमते यहां पर आये तब सीता मां को बहुत प्यास लगी । लक्ष्मण जी ने अपने तीर इस स्थान पर मारा जिससे पृथ्वी में से पानी निकला और यहां एक बावडी बन गई जिसे लक्ष्मण बावड़ी कहा जाता है। माता सीता ने इसी बावड़ी के जल से अपना उपवास खोला था। तभी भगवान राम ने चिंतामण, लक्ष्मण ने इच्छामण एवं सिद्धिविनायक की पूजा अर्चना की थी। मंदिर के सामने ही आज भी वह बावडी मौजूद है। जहां पर दर्शनार्थी दर्शन करते है। इस मंदिर का वर्तमान स्वरूप महारानी अहिल्याबाई द्वारा करीब 250 वर्ष पूर्व बनाया गया था। इससे भी पूर्व परमार काल में भी इस मंदिर का जिर्णोद्धार हो चुका है। यह मंदिर जिन खंबों पर टिका हुआ है वह परमार कालीन हैं।

 

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