अहमदाबाद था कर्णावती, जामा मस्जिद थी भद्रकाली मंदिर

bhadrakali temple ahmedabad

ये कहानी है एक सुंदर बसाहट वाले गौरवशाली हिंदू शहर की, जिसे आज से करीब 700 साल पहले इतिहास में गुम कर दिया गया, और फिर एक मुस्लिम आक्रांता के नाम पर बसाकर यह झूठ फैलाया गया कि इसे उसी ने बसाया है । इस नगर की अद्भुत शौर्य-गाथा को खत्म कर रक्तरंजित बना देने की ये कहानी 1400 सदी में लिखी गई थी। यह कहानी कर्णावती शहर की है, जिसे आज आप अहमदाबाद के रूप में जानते हैं।

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गुजरात का यह गौरवशाली नगर अलग-अलग युग में अलग-अलग नामों से जाना गया। कभी भद्रा, कभी कर्णावती, कभी राजनगर तो कभी असावल। मगर इन सारे नामों में एक बात आम रही कि ये सब हिंदू नाम थे। 9वीं से 14वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र पर मालवा-राजस्थान के शूरवीर परमार राजाओं का राज्य रहा। यह तथ्य है कि परमारों के दौर में यह नगर बहुत समृद्ध और खुशहाल हुआ करता था।



फिर दौर आया जीवन-रस से भरपूर भारत में भूखे भेडि़यों के घुस आने का। यह दौर एक ऐसे भारत पर मुस्लिम आक्रांताओं के बर्बर हमलों का समय था, जब इस महान देश को खूब लूटा—खसोटा—नोंचा गया। सौन्दर्य, खान—पान, संगीत, पठन—पाठन और अच्छा जीवन जीने के शौकीन भारतीय हिंदुओं पर मुस्लिम आक्रांताओं ने लगातार हमले किए। तब तक, जब तक कि लड़ाका, शूरवीर या तो मारे नहीं गए, या टूट नहीं गए या फिर हाथ मिलाने को मजबूर नहीं हो गए।

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पूरे भारत की देह पर जब मुस्लिम आक्रांताओं के रक्तरंजित खंजर अपने निशान गोद रहे थे, उसी दौर में कर्णावती पर भी पुरजोर हमला हुआ। यह समय 1400 ईस्वी का था। अपने व्यापार और समृद्धि के कारण प्रसिद्ध यह नगर भेडियों के नाखूनों से खूब नोंचा गया। बाजार उजाड़ दिए गए, मंदिर तोड़ दिए गए, लोगों को सरेआम हलाल किया, बच्चों को जिबह कर दिया गया। स्त्रियों के साथ क्या हुआ होगा, यह सोचना आज 700 साल बाद भी कंपकंपा देता है।



हमलावर था अहमद शाह और उसने कर्णावती का नाम अपने घिनौने नाम पर कर दिया अहमदाबाद। रक्तरंजित, हारे और क्लांत नगर की पीठ पर लिख दिया गया कि ‘इस नगर को अहमद ने आबाद किया इसलिए ये अहमदाबाद कहलाया’। और फिर शुरू हुआ कर्णावती की पहचान बदलने का षड्यंत्र। कर्णावती के विराट मां भद्रकाली के मंदिर का शिखर तोड़ा और उस पर तान दिया गुंबद। संस्कृत के मंत्र लिखे खंभे नोंचे गए और उन पर लिख दी गई हमलावरों की भाषा। मंदिर की छतों के भीतर पत्थर पर उकेरे गए सुंदर कमल के फूल मसल दिए गए। हजारों वर्षों तक जिस सभ्यता ने पल—पल करके बेजान पत्थरों के भीतर भी सौन्दर्य रचना सीखा था, उस सभ्यता के निशानों को असभ्य, उज्जड़ और अहमक आक्रांताओं ने नेस्तनाबूद कर दिया।



अंतत: भद्रकाली मंदिर को जामा मस्जिद बना दिया गया, और उस पर ठप्पा ठोंक दिया कि ये ‘इस्लामी—अरबिक शैली की खूबसूरत इमारत है’। हुह…..सौन्‍दर्यप्रिय। जिन्‍होंने कभी रेतीले रेगिस्‍तान से आगे कुछ देखा न था, वे भूखे भेडि़ए कब से सौन्‍दर्यप्रिय हो गए थे ।

आज भी आप उस महान नगर कर्णावती यानी अहमदाबाद जाकर वहां स्थित उस भद्रकाली मंदिर यानी जामा मस्जिद की दीवारों पर देख सकते हैं कि वहां दीवारों—खंभों पर हाथी उकेरे हुए हैं, कमल के सुंदर फूल बने हुए हैं, देवी—देवताओं की प्रतिमाएं हैं। यदि इसे अहमद शाह ही बनवाता तो वह हिंदू देवी—देवताओं की प्रतिमाएं क्यों बनवाता! इस्लाम में तो मूर्तिपूजा हराम है ना!

अब आप अपने उस वक्त के रक्तपात से उपजे दुख को वर्तमान समय में ले आइए और गूगल पर अहमदाबाद या जामा मस्जिद खोजिए। आपको इस शहर का इतिहास 1400 ईस्वी के बाद का ही मिलेगा। प्रश्न बनता है कि आखिर मोटी तनख्वाह ले रहे ‘आर्कियोलॉजिकल सर्वे आॅफ इंडिया’ के मोटे पेट वाले अफसर क्या कर रहे हैं। क्‍या वे हमारे दिए गए टैक्‍स के टुकड़ों पर पलकर अपने देश की जनता को सच्ची जानकारी तक नहीं दे सकते!

और हिंदुओं की अंटागफीली नींद का आलम देखिए कि पिछले दिनों जब अहमदाबाद शहर का नाम बदलने के लिए वहीं के रहवासियों के बीच सर्वे किया गया तो अधिकांश ‘भ्रमित यूथ’ ने कहा — वी आर ओके विथ अहमदाबाद! यानी हमें तो यही नाम पसंद है, बदलने की कोई जरूरत नहीं।



…तो ये है एक सुंदर नगर को बलात खत्म कर देने और उस पर अपने कुत्सित मंसूबों का शहर खड़ा कर देने की कहानी। एक सभ्यता जो लुटती गई, बर्बाद होती गई, अपनी जमीन छोड़ती गई और फिर भी नींद से न जागी।

हे मां भद्रकाली! फिर किसी कर्णावती नगर को इतिहास के कैनवास से यूं मत मिटा देना कि उसके अस्तित्व का कोई नामोनिशां उसके बच्चों के दिल में भी न बचे।

(-पत्रकार ईश्वर शर्मा जी द्वारा लिखी गई महत्वपूर्ण जानकारी। )
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