चमत्कारिक है माता बमलेश्वरी देवी का मंदिर, PM से लेकर CM तक आते हैं दर्शन करने

maa bamleshwari devi dongargarh

(maa bamleshwari devi mandir dongargarh at chhattisgarh)

डोंगरगढ़. छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में हरी-भरी वादियों के बीच झील किनारे मां बमलेश्वरी हजार सीढिय़ां चढऩे पर दिव्य दर्शन देती हैं। मान्यता हैं कि माता के आशीर्वाद मात्र से ही शत्रु परास्त हो जाते है। ऐसा चमत्कार कई भक्तों के साथ हुआ भी हैं। मां बमलेश्वरी को मां बगलामुखी का रूप भी माना जाता है। मां अपने भक्तों को विजय का वरदान देती हैं।
साल के दोनों नवरात्रों में यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है और मां के दर्शन कर भक्त खुद को धन्य करते हैं। डोंगरगढ़ में जमीन से करीब 2 हजार फीट की ऊंचाई पर विराजती है मां बमलेश्वरी।

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यह है मां के चमत्कार की कहानी

प्राचीन काल में यह स्थान कामावती नगर के नाम से विख्यात था। कहते हैं यहां के राजा कामसेन बड़े प्रतापी और संगीत-कला के प्रेमी थे। राजा कामसेन के ऊपर बमलेश्वरी माता की विशेष कृपा थी। उनके राज दरबार में कामकंदला नाम की अति सुंदर राज नर्तकी और माधवानल जैसे संगीतकार थे। एक बार दोनों की कला से प्रसन्न होकर राजा ने माधवानल को अपने गले का हार दे दिया। माधवानल ने इसका श्रेय कामकंदला को देते हुए वह हार उसको पहना दिया। इससे राजा ने अपने को अपमानित महसूस किया और गुस्से में आकर माधवानल को राज्य से बाहर निकाल दिया। इसके बावजूद कामकंदला और माधवानल छिप-छिपकर मिलते रहे।
एक बार माधवानल उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की शरण में गए और उनका मन जीतकर उनसे पुरस्कार स्वरूप कामकंदला को राजा कामसेन से मुक्त कराने की बात कही। राजा विक्रमादित्य ने दोनों के प्रेम की परीक्षा ली और दोनों को खरा पाकर कामकंदला की मुक्ति के लिए पहले राजा कामसेन के पास संदेश भिजवाया। राजा के इनकार करने पर दोनों के बीच युद्ध छिड़ गया। दोनों वीर योद्धा थे और एक महाकाल का भक्त था तो दूसरा विमला माता का। दोनों ने अपने-अपने इष्टदेव का आह्वान किया तो एक ओर से महाकाल और दूसरी ओर भगवती विमला मां अपने-अपने भक्तों की सहायता करने पहुंचे।

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युद्ध के दुष्परिणाम को देखते हुए महाकाल ने विमला माता से राजा विक्रमादित्य को क्षमा करने की प्रार्थना की और कामकंदला और माधवानल को मिलाकर वे दोनों अंतध्र्यान हो गए। वही विमला मां आज बमलेश्वरी देवी के रूप में छत्तीसगढ़ वासियों की अधिष्ठात्री देवी हैं। अतीत के अनेक तथ्यों को अपने गर्भ में समेटे ये पहाड़ी अनादिकाल से जगत जननी मां बमलेश्वरी देवी की सर्वोच्च शाश्वत शक्ति का साक्षी है। मां बमलेश्वरी के आशीर्वाद से भक्तों को शत्रुओं को परास्त करने की शक्ति मिलती है साथ ही विजय का वरदान मिलता है. मुश्किलों को हर कर मां अपने भक्तों को मुश्किलों से लडऩे की रास्ता दिखाती हैं।

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भक्ति का अलौकिक नजारा

मां बमलेश्वरी के दरबार में दो पहर होने वाली आरती का महत्व भी कुछ कम नहीं है। घंटी-घडियालों के बीच आरती की लौ के साथ श्रद्धालुओं की भीड़, माता के गीतों को गाते-गुनगुनाते हैं. मां बमलेश्वरी के मंदिर में भक्ति का अलौकिक नजारा देखने वालों को बांध लेता है, भक्ति के रस में डुबो देता है.
मां बगलामुखी के दरबार में हवन करने की विधि बेहद अनूठी है क्योंकि यहां हवन सामग्री में लाल मिर्च का इस्तेमाल किया जाता है। कहते हैं लाल मिर्च को शत्रु नाशक माना जाता है, जिसका पूजा में इस्तेमाल करने से शत्रुओं का नाश हो जाता है। मां बमलेश्वरी बगलामुखी का रूप हैं,तबसे माँ बगुलामुखी अपभ्रंश बमलाई देवी साक्षात महाकाली रूप मे डोंगरगढ मे प्रतिष्ठित है। सन 1964 मे खैरागढ रियासत के भूतपूर्व नरेश श्री राजा बहादुर, वीरेन्द्र बहादुर सिंह द्वारा मंदिर के संचालन का भार माँ बम्लेश्वरी ट्रस्ट कमेटी को सौंपा गया था।

मां ने विक्रमादित्य को दिए थे वरदान
पंडित युवराज शर्मा, मुख्य पुजारी माँ बम्लेश्वरी मंदिर कहते हैं कि राजा विक्रमादित्य जो यहाँ तप कर रहे थे माँ भगवती यहाँ प्रकट हुई राजा विक्रमादित्य ने माता से तीन वरदान मांगे, पहला वरदान भक्तों के कल्याण के लिए आप पर्वत पर विराजमान हो।

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