Bakrid2017: जानें क्यों मनाते हैं बकरीद, बकरे की कुर्बानी के लिए अल्लाह ने बताई इस्लाम की यह बातें

Bakra Eid 2017

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इस्लाम धर्म के खास त्योहार ईद की तैयारियां जोरों पर हैं। साल में दो तरह की ईद मनाई जाती हैं। एक मीठी ईद यानी ईद उल फितर और दूसरी बकरीद यानी ईद उल जुहा। एक ईद समाज में मिठास घोलने का प्रतिक हैं तो दूसरी ईद अपने कर्तव्य के प्रति जिम्मेदारी का सबक सिखाती हैं। भारत में इस साल 2 सितंबर को ईद-उल-जुहा (बकरीद) मनाई जाना तय हैं। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार ईद-उल-जुहा 12 वें महीने धू अल-हिज्जा के दसवें दिन मनाई जाती हैं।




यह है बकरीद की कहानी
खादिम ए आला चंगेज खान अशरफी, बाबा कचहरी वाले दरगाह के अनुसार एक बार इब्राहीम अलैय सलाम नाम के एक व्यक्ति थे, जिन्होंने सपने में अल्लाह का हुक्म सुना। वे अपने बेटे इस्माइल अल्लाह की राह में कुर्बान कर दें। यह इब्राहीम अलैय सलाम के लिए एक कड़ी परीक्षा से भी बढ़कर था।

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लेकिन एक ओर बेटे से जान से अधिक प्यार था तो दूसरी ओर अल्लाह का हुक्मा था। मगर अल्लाह का हुक्म नहीं मानना अपने धर्म की तौहीन करने के बराबर था। जो इब्राहीम अलैय को कभी भी मंजूर नहीं था। इस वजह से अपने बेटे की कुर्बानी देने का निर्णय लिया। इस कहानी के मुताबिक इब्राहीम अलैय सलाम छुरी लेकर अपने बेटे को कुर्बान करने लगे। जैसे ही फरिश्ते के सरदार जिब्रील अमीन ने बिजली की तेजी से आकर बच्चे की जगह मेमने को रख दिया और बच्चे की जान बच गई। इसके बाद से ही मेमने यानी बकरे की कुर्बानी का रिवज शुरु हुआ।

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यह है बकरीद की परंपरा
बकरीद त्योहार पर एक परंपरा निभाई जाती हैं। इस्लाम में गरीबों और मजलूमों का विशेष ख्याल किया जाता हैं। यही कारण हैं कि बकरीद पर कुर्बानी का गोश्त तीन हिस्सों में बांटा जाता हैं। एक हिस्सा जो काटता है, वह अपने व परिवार के लिए रखता हैं। शेष दो हिस्से समाज के गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए होते हैं।

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