अंग्रेजों को दिखाया था अस्पताल वाले बाबा ने चमत्कार, यहां पूरी होती है सबकी मुरादें

Amazing Story Of Aspatal Wale Baba Raipur Chhattisgarh

(Chamatkari Aspatal Wale Baba Ki dargah Raipur Chhattisgarh)

रायपुर. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुराने डीके अस्पताल परिसर में अंग्रेजों की जमाने की चमत्कारिक अस्पताल वाले बाबा की दरगाह हैं। बाबा ने यहां अंग्रेजों को अपना चमत्कार बताया था।

बाबा के चमत्कार के आगे अंग्रेजों को झूकना पड़ा था। तब से हजरत सैयद बंदे अली शाह उर्फ अस्पताल वाले बाबा की दरगाह पर मुरादें मांगने वालों का तांता लगा रहता हैं। यहां छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि देशभर के कई जगहों से लोग अपनी मुराद लेकर आते हैं। बाबा की दरगाह पर श्रद्धालु अपनी इच्छा से प्रसाद आदि चढ़ा सकते हैं।



यहां सभी धर्मों के लोग श्रद्धापूवर्क अपनी मुराद बाबा के सामने रखते हैं, यहां मान्यता हैं कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद जरुर पूरी होती हैं। आइए जानते हैं बाबा के चमत्कार और बाबा रायपुर में कैसे आए…

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अंग्रेजों को दिखाया था यह चमत्कार (asptal wale baba ki dargah ka chamatkar )

खादीम साहब (सेवक) हाजी सैयद रमजान अली बताते हैं कि 1960 के पहले यहां दाउ कल्याण सिंह चिकित्सालय का निर्माण किया जा रहा था। तभी मजार से सटी हुई अस्पताल की एक दीवार जिसे दिन में बनाया जाता और वह रात को गिर जाती थी। कई दिनों तक ऐसा होता रहा। अंग्रेज इंजीनियर ने सभी से पूछा ऐसा क्यों हो रहा हैं, एक मुसलमान व्यक्ति ने उसे बताया कि यहां पर एक पाक हस्ती की मजार है।



बाबा ऐसा नहीं चाहते हैं, कि उन्हें चारों तरफ से दीवार से घेरा जाए। फिर वह दीवार अंग्रेजों को अधूरी छोडऩा पड़ी वह आज भी वैसी ही है। यहां जो भी श्रद्धालु जाते हैं, वे यह अधूरी दीवार देख सकते हैं।

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ऐसे बनी दरगाह (baba ki dargah dikhao)

बाबा का 1813 में रायपुर में आगमन हुआ। वे रायपुर से करीब 120 किमी दूर, बिलासपुर के सीपत के पास झलमला गांव के रहने वाले थे। गांव में उनके भाई मोहम्मद अली भी साथ रहते थे। 1852 में घांस की वजह से गांव के ही दो गुटों में विवाद हो गया। इसमें एक पक्ष में यह खुद थे और उनके साथ वाले कुछ लोग थे।



इस समय अंग्रेजों का शासन था, जिससे दोनों गुटों के विवाद में इनको रायपुर जेल में लाया गया और 1852 में इनको जिस जगह मजार हैं, उसी जगह फांसी दे दी गई और इसी तरह यहां उनकी मजार (समाधी) बनाई गई। इस तरीके से धीरे-धीरे मुराद मांगने वालों की मुराद पूरी होती गई और धीरे-धीरे लोगों की श्रद्धा बढ़ती गई।

 

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